कैसा समाज बनाएंगे हम?

क्या कानून की जवाबदेही केवल देश के संविधान के ही प्रति है? क्या सभ्यता और नैतिकता के प्रति कानून जवाबदेह नहीं है ? क्या ऐसा भी हो सकता है कि एक व्यक्ति का आचरण कानून के दायरे में तो आता हो लेकिन नैतिकता के नहीं? दरअसल माननीय न्यायालय के हाल के कुछ आदेशों ने ऐसा … Read more

आस्था या रोजी रोटी राम मंदिर का सहारा

श्री रामजी रघुकुल के सूर्यवंशी क्षत्रिय वंश के राजा थे लेकिन एक बात समझ में नहीं आती की अधिकांश क्षत्रिय राम मंदिर आंदोलन से दूर हैं परन्तु यह भी आश्चर्य जनक सच है की पूरी ब्राह्मण लॉबी और वैश्य लॉबी इस राम आंदोलन में जी जान से जुटी हुई है क्या इस आंदोलन के पीछे … Read more

न रख इतना नाज़ुक दिल

इश्क़ किया तो फिर न रख इतना नाज़ुक दिल माशूक़१ से मिलना नहीं आसाँ, ये राहे-मुस्तक़िल२ तैयार मुसीबत को, न कर सकूँगा दिल मुंतकिल३ क़ुर्बान इस ग़म को तिरि ख़्वाहिश४ मिरि मंज़िल मुक़द्दर५ यूँ सही महबूब तिरि उल्फ़त६ में बिस्मिल७ तसव्वुर८ में तिरा छूना हक़ीक़त९ में हुआ दाख़िल कोई हद नहीं बेसब्र दिल जो कभी … Read more

त्यौहारों की संस्कृति का धुंधलाना

दीपावली जैसे त्योहार के मौके पर खुशियों का इजहार करने के लिए बेहतर खानपान और रोशनी की सजावट से पैदा जगमग के अलावा कानफोडू पटाखों का सहारा लोगों को कुछ देर की खुशी तो दे सकता है, लेकिन उसका असर व्यापक होता है। पटाखों की आवाज और धुएं के पर्यावरण सहित लोगों की सेहत पर … Read more

आई .. आई .. सीबीआई ….!!

सीबीआई विवाद पर खांटी खड़गपुरिया तारकेश कुमार ओझा का पंच … हम समझते थे , कुछ बात है तुममें जरा अलग है हस्ती तुम्हारी … लेकिन यह क्या , यहां भी वही छीनाझपटी और खींचतान की बीमारी वही मैं बड़ा और स्वार्थ का झगड़ा पद, पैसा और पावर का लफड़ा बड़ा शोर सुनते थे आई … Read more

हम बाजार में या हम में बाजार ?

फैशन के इस दौर में इतने तरह के पहनावे इजाद हो गए हैं कि हम बाजार के लिए एक प्रयोगशाला बनकर रह गए हैं। कपड़े अब सिर्फ पहनावा भर नहीं हैं बल्कि देह को सजाने का सबसे जरूरी माध्यम बन गए हैं। इस बाजार युग में बाजार कुछ भी बेच रहा है, हम कुछ भी … Read more

वैंकय्या नायडू का हिन्दी भाषा का दर्द समझें

हिन्दी की दुर्दशा आहत करने वाली है। इस दुर्दशा के लिये हिन्दी वालों का जितना हाथ है, उतना किसी अन्य का नहीं। अंग्रेजों के राज में यानी दो सौ साल में अंग्रेजी उतनी नहीं बढ़ी, जितनी पिछले सात दशकों में बढ़ी है। इस त्रासद स्थिति की पड़ताल के लिये हिन्दी वालों को अपना अंतस खंगालना … Read more

पाने की चाह

पाने की चाह में खोने का डर सताता है बिना कुछ पाए ही दिल सहम जाता है फ़ितरत१ में जुड़ा है ये डर जाना सहम जाना रुका था न रुकेगा इंसाँ का बहक जाना लाख दुआएँ कर लो फिर भी फ़ितरत न मिटेगी ये ज़ोफ़-ए-इंसाँ२ है जनाज़े तक रहेगी डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ शब्दार्थ: १. … Read more

भूल चूक मुआफ़

हमारे प्रिय नेताजी छीन-झपट कर बैठे न सुधरे जनता से छल-कपट कर बैठे सड़कें ख़राब थी बिजली भी नहीं आती हम बिजली के बटन चट-पट कर बैठे दिमाग़ आज हमारा बहुत ख़राब हुआ घर पर हम पत्नी से खट-पट कर बैठे अब बदला लेने की ठान ली थी इसलिए बाक़ी सारा काम ख़त्म झट-पट कर … Read more

मी टू की होली…!!

अरसे बाद अभिनेता नाना पाटेकर बनाम गुमनाम सी हो चुकी अभिनेत्री तनुश्री दत्ता प्रकरण को एक बार फिर नए सिरे से सुर्खियां बनते देख मैं हैरान था। क्योंकि भोजन के समय रोज टेलीविजन के सामने बैठने पर आज की मी टू से जुड़ी खबरें… की तर्ज पर कुछ न कुछ चैनलों की ओर से नियमित … Read more

घूसखोरी में अव्वल होता भारत

देश एवं समाज में रिश्वत देने वालों व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है, ऐसे व्यक्तियों की भी कमी हो रही है जो बेदाग चरित्र हों। विडम्बना तो यह है कि भ्रष्टाचार दूर होने के तमाम दावों के बीच भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है। भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन रहा है। ट्रांसपैरंसी इंटरनैशनल इंडिया द्वारा किए गए … Read more