ठोस कचरा प्रबंधन के बाल दूत

zzस्कूल जाने के समय पर ये बच्चे और ऐसे अनेक बच्चे कंधे पर झोला लटकाए कचरा बीनने निकल पड़ते हैं । बहुत से पुरुष, महिलाएं और वृद्ध भी यह कार्य करते हैं । इनके लिए भले ही ये जीवन यापन की मजबूरी हो पर शहर को स्वच्छ रखने में इनका महत्वपूर्ण योगदान है । जहां एक ओर हमारा नियोजित कचरा प्रबंधन मिक्स्ड कचरा उठा रहा है वहीं ये इसे seggregate करके रीसाइक्लिंग को बढ़ावा दे रहे हैं । पर कचरा इकट्ठा करने की इनकी प्रक्रिया सुरक्षित नहीं हैं । खुले हाथ, पैर और मुंह के साथ ये हर प्रकार के कचरे में काम की चीजें ढूंढते हैं और अक्सर कचरे में कील, कांटे, कांच, हानिकारक रसायन, दूषित वस्तुएं और यहां तक कि हॉस्पिटल वेस्ट भी होता है । सामाजिक तौर पर भी इन्हें तिरस्कार और बड़े कबाड़ी के शोषण से ज्यादा कुछ नहीं मिलता । पर इनके द्वारा कमाया गया 40-50 रुपया घर की रोटी चलाने में सहयोगी होता है और एवज में ये अपना बचपन और स्कूली शिक्षा खोकर अक्सर नशे और अपराध की दुनिया की ओर बढ़ जाते हैं । देखने वाली बात ये है कि क्या कचरा बीनने वालों को हमारी ठोस कचरा प्रबंधन प्रणाली का हिस्सा बन कर इन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से रोटी कमाने का अवसर दिया जा सकता है और वो भी इस तरह कि बच्चों की स्कूल शिक्षा भी चलती रहे ? कहते हैं कि अच्छा बदलाव धीरे धीरे ही आता है पर इस मामले में कुछ जल्दी हो तो इन बच्चों के लिए बेहतर होगा । वरना इनकी कुछ और पीढियां यूं ही जीवन गुजार देंगी ।

अजमेर के सुपरिचित इंजीनियर व बुद्धजीवी अनिल जैन की फेसबुक वाल से साभार

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