रावत समाज ने ठोकी ताल, भाजपा की बढ़ी मुसीबत

तेजवानी गिरधर
तेजवानी गिरधर
अजमेर जिले के रावत समाज ने आगामी नवंबर-दिसंबर में अजमेर संसदीय क्षेत्र के संभावित चुनाव के लिए ताल ठोक दी है। समाज किसी रावत को टिकट देने की मांग कर रहा है। भाजपा के लिए यह मुसीबत का सबब है। वह इस चुनौती से कैसे निपटेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
असल में भाजपा की लगभग मजबूरी सी है कि वह किसी जाट को ही टिकट दे। एक तो इस वजह से कि यह सीट प्रो. सांवरलाल जाट के निधन से खाली हुई है, दूसरा ये कि अजमेर संसदीय क्षेत्र अब जाट बहुल माना जाता है। हालांकि रावत मतदाताओं की संख्या भी कम नहीं है, जिनका रुझान भाजपा की ओर रहता आया है। ज्ञातव्य है कि पांच बार लोकसभा का चुनाव प्रो. रासासिंह रावत ने समाज के वोटों के दम पर ही जीता था। हर एक चुनाव को छोड़ कर पांच बार अस्सी से नब्बे प्रतिशत मतदान करने वाले रावतों और पार्टी के जनाधार वाले वोटों के योग से प्रो. रावत को जीतने में दिक्कत नहीं होती थी। केवल एक बार डॉ. प्रभा ठाकुर उन्हें हरा पाई, वो भी इसलिए कि उन्होंने भाजपा के राजपूत वोट बैंक में सेंध मारी थी। खैर, रासासिंह रावत का अवसान तब जा कर हुआ, जब परिसीमन में इस संसदीय क्षेत्र का रावत बहुल इलाका मगरा कट गया। अकेले इसी वजह से भाजपा ने प्रो. रावत को टिकट नहीं दिया गया। उनके स्थान पर भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को लाया गया और वे मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट से हार गईं। इसके बाद में हुए चुनाव में भाजपा ने प्रो. जाट पर दाव खेला और जाटों की बहुलता व विशेष रूप से मोदी लहर के कारण वह प्रयोग सफल रहा। लहर इतनी प्रचंड थी कि लोग सचिन पायलट के कराए गए कामों को ही भूल बैठे। अब जबकि प्रो. जाट का निधन हो गया है, ऐसे में भाजपा पर दबाव है कि वह किसी जाट को और विशेष रूप से प्रो. जाट के परिवार से किसी को टिकट दे। हालांकि प्रो. रावत के पांच बार सांसद बनने से रावत भाजपा मानसिकता के ही माने जाते हैं, मगर जिस प्रकार उन्होंने ताल ठोकी है, वह भाजपा के लिए चिंता का कारण है। एक ओर वह किसी गैर जाट को टिकट दे कर जाटों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगी, दूसरी ओर वर्षों से कायम अपने रावत वोट बैंक को भी नहीं खोना चाहेगी। ऐसा नहीं है कि रावतों का जिले में प्रतिनिधित्व नहीं है। पुष्कर के विधायक सुरेश रावत हैं। इसके अतिरिक्त संसदीय क्षेत्र से ही सटे और जिले के ब्यावर से भी शंकर सिंह रावत विधायक हैं। ऐसे में रावतों का टिकट के लिए अडऩा अटपटा है, मगर लोकतंत्र में कुछ न कुछ हासिल करने के लिए समाज अड़ते ही हैं। अब देखना ये होगा कि भाजपा रावतों के कितने दबाव में आती है।
रहा कांग्रेस का सवाल तो उसके लिए रावत एक बेहतरीन कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गुर्जरों, अनुसूचित जाति व मुस्लिमों के वोट तो बहुतायत में कांग्रेस को मिलने ही हैं। कांग्रेस के पास एक और कार्ड राजपूतों का भी है। वे भी भाजपा मानसिकता के माने जाते हैं, मगर कुख्यात आनंदपाल मामले के बाद भाजपा से रुष्ठ हैं। ऐसे में कांग्रेस राजपूत कार्ड भी खेल सकती है, जो कि एक बार प्रभा ठाकुर के रूप में सफल हो चुका है। इस लिहाज से कांग्रेस सुविधानजक स्थिति में है। उसके पास बहुत विकल्प हैं। गुर्जर कार्ड के अतिरिक्त वह किसी दिग्गज जाट को भी मैदान में उतार सकती है। इस सिलसिले में राजस्थान के दिग्गज जाट नेता स्वर्गीय परसराम मदेरणा की पोती दिव्या मदेरणा का नाम चर्चा में आया है। बहरहाल, जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएंगे कई नाम उभरेंगे व डूबेंगे। प्रत्याशियों का फैसला नामांकन पत्र भरने की तिथी से एक-दो दिन पहले ही हो पाएगा। तब तक चर्चाओं की जुगाली चलती रहेगी।
-तेजवानी गिरधर
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