सचिन पायलट का तोड़ नहीं है भाजपा के पास

sachinहालांकि अभी पक्के तौर कहना कठिन है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट अजमेर लोकसभा सीट का उपचुनाव लड़ेंगे ही, मगर इसकी प्रबल संभावना के मद्देनजर भाजपा तनिक चिंतित नजर आ रही है। उसके पास उनका तोड़ नहीं है। स्थानीय स्तर पर कोई विकल्प न अब है और न ही उनके पहले चुनाव के समय था। तब भी भाजपा को किरण माहेश्वरी को अजमेर से लड़ाना पड़ा था और वे हार गई थीं। हालांकि दूसरे चुनाव में राज्य किसान आयोग के पूर्व अध्यक्ष व अजमेर के भूतपूर्व सांसद प्रो. सांवरलाल जाट ने जरूर उन्हें हराया था, मगर उसकी एक मात्र वजह थी देशव्यापी मोदी लहर।
वस्तुत: सचिन पायलट इस कारण मजबूत प्रत्याशी नहीं हैं कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, अपितु इस वजह से हैं क्योंकि जब वे अजमेर के सांसद और केन्द्र में मंत्री थे, तब उन्होंने अनेक उल्लेखनीय काम कराए थे। अजमेर के वे पहले जनप्रतिनिधि थे, जिन्हें केन्द्रीय मंत्रीमंडल में मौका मिला था। कांग्रेस हाईकमान से नजदीकी के चलते कई महत्वपूर्ण विकास कार्य उन्होंने आसानी से करवा लिए। जनता यह बखूबी जानती है कि जितने काम उन्होंने पांच साल में करवाए, उनका एक प्रतिशत भी यहां से पांच बार सांसद रहे भाजपा के प्रो. रासासिंह रावत नहीं करवा पाए। असल में वे पांच बार जीतने के बाद भी कभी महत्वपूर्ण स्थिति में नहीं रहे।
बहरहाल, आज जब फिर सचिन पायलट के अजमेर से लडऩे की संभावना है, भाजपा उनको टक्कर देने के लिए उपयुक्त प्रत्याशी की तलाश कर रही है। एक तो सचिन पायलट के प्रति जनता का विश्वास है, दूसरा केन्द्र व राज्य सरकार के प्रति एंटीइंकंबेसी फैक्टर भी काम कर रहा है। ऐसे में स्थानीय कोई भी भाजपा नेता उनको टक्कर देने की स्थिति में नहीं है। स्वर्गीय प्रो. सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा टिकट हासिल करने के लिए पूरा दबाव बनाए हुए हैं, मगर भाजपा हाईकमान उन पर दाव खेलने से पहले दस बार सोचने को मजबूर है। भाजपा की सबसे बड़ी मजबूरी ये है कि उसे किसी भी सूरत में किसी जाट को ही टिकट देना है। अगर किसी गैर जाट को टिकट देती है तो पूरा जाट समुदाय खिलाफ जा सकता है। लांबा के अतिरिक्त भाजपा के पास अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी व पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गेना के श्वसुर सी बी गेना हैं, मगर वे भी सचिन पायलट का मुकाबला कर पाएंगे या नहीं, इस पर भाजपा में गंभीर मंथन चल रहा है। एक संभावना ये भी बताई जा रही है कि भाजपा प्रमुख जाट नेता सतीश पूनिया पर दाव खेल ले। यूं गैर जाटों में देहात जिला भाजपा अध्यक्ष डॉ. बी पी सारस्वत, पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा, नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन आदि के नाम चर्चा में हैं।
भाजपा को अगर भरोसा है तो केवल इस पर कि वह सत्ता में हैं और सरकारी मशीनरी का आसानी से दुरुपयोग कर सकती है। संभव है कि सत्ता के दम पर वह कांग्रेस में तोडफ़ोड़ करे, हालांकि इसकी संभावना कुछ कम इस कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा का परफोरमेंस बेहतर होने में संदेह है। अगर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कमान संभाली तो यह तय है कि यहां धनबल का भी खूब इस्तेमाल होगा, लेकिन उससे सचिन पायलट को फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे भी सक्षम हैं। सचिन पायलट के अजमेर से लडऩे की संभावना के मद्देनजर ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अजमेर का तीन दिन का दौरा करने वाली हैं। उनके निर्देश पर अनेक मंत्री यहां दौरा कर प्रशासन को चुस्त कर चुके हैं, मगर पिछले साढ़े तीन साल से विकास को तरस रही जनता का मूड बदलेगा, इसको लेकर संदेह है।
कुल मिला कर सचिन पायलट के यहां से लडऩे के आसार होने के कारण भाजपा तनिक परेशान हैं। इसकी बड़ी वजह ये है कि अगर भाजपा हारती है तो यह संकेत जाएगा कि मोदी का जादू व वसुंधरा का आकर्षण खत्म हो गया है, जिसका आगामी विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ेगा। सचिन पायलट या कोई अन्य कांग्रेसी प्रत्याशी जीतता है तो कांग्रेस कार्यकर्ता का इकबाल ऊंचा होगा, जो विधानसभा चुनाव में जोश प्रदान करेगा। खैर, देखते हैं, आगे होता है क्या?

तेजवानी गिरधर
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