हाथ को किसानों में सारथी की तलाश

मिर्धाओं की चौथी पीढ़ी बन रही नई संभावना
raghuvendra mirdhaराजस्थान एक ऐसा प्रदेश, जिसकी राजनीतिक जमीन पर कांग्रेस का े अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा भरोसा है। हालांकि कांग्रेस इस साल पंजाब जीत चुकी है, लेकिन मरुभूमि में पार्टी बड़ी जीत के ख्वाब संजोये है। ये ख्वाब कितने हकीकत में बदलेंगे, यह जल्द ही तय होने वाला है क्योंकि प्रदेश में अजमेर और अलवर में दो भाजपा सांसदों के निधन से रिक्त हुई लोकसभा सीटों पर शीघ्र चुनावी तारीख आनी है। वहीं मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर भी भाजपा विधायक के निधन से चुनाव होने हैं। पंजाब के गुरदासपुर संसदीय क्षेत्र में जीत से उत्साहित कांग्रेस अब किसी भी कीमत पर अजमेर और अलवर की सीटें जीतने को बेताब है।
गुरदासपुर में कांग्रेस की प्रतिष्ठा जहां देश के दिग्गज किसान नेता रहे स्वर्गीय बलराम जाखड़ के पुत्र सुनील जाखड़ ने बचाई है, जो कि पंजाब पीसीसी के अध्यक्ष भी हैं। दूसरी ओर राजस्थान में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट किसान राजनीति में किसी असरदार चेहरे का अभाव है। गौरतलब है कि राजस्थान की 70 फीसदी आबादी किसान है और कृषि आज भी प्रदेश की प्रमुख अर्थ व्यवस्था है, जिसकी धुरी प्रदेश का जाट समुदाय है, जो राज्य की कुल 200 विधानसभा सीटों में से आधी पर असरदार है।
राजस्थान में जाटों का राजनीतिक झुकाव करीब 50 साल तक कांग्रेस के साथ रहा। यह वो दौर था, जब प्रदेश में रामनिवास मिर्धा और परसराम मदेरणा जैसे दिग्गज किसान नेता कांग्रेस की राजनीतिक धुरी थे, लेकिन प्रदेश में कभी कोई जाट मुख्यमंत्री नहीं बन सका और मदेरणा व मिर्धा के बाद कांग्रेस किसी किसान नेता को उभारने में विफल रही। इसका फायदा भाजपा ने जाटों में घुसपैठ कर उठाया।
आज कांग्रेस प्रदेश में किसानों का साथ फिर से हासिल करना चाहती है, इसी परिप्रेक्ष्य में पिछले दिनों प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र बारां से झालावाड़ तक किसान न्याय पदयात्रा की, लेकिन कांग्रेस की असली चिंता मारवाड़ और शेखावाटी सूबे के किसान प्रधान इलाकों में किसानों का समर्थन जुटाने की है। पिछले दिनों शेखावाटी में कम्युनिस्टों ने एक बार फिर किसानों को अपने मंच तले जुटा कर भाजपा और कांग्रेस दोनों की नींद उड़ा दी है। ऐसे में कांग्रेस किसान राजनीति पर ध्यान केन्द्रित करते हुए ऐसे चेहरे की तलाश में है, जो किसानों को प्रभावित कर सके। इसी संदर्भ में पूर्व केन्द्रीय मंत्री रामनिवास मिर्धा के पौत्र और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष परसराम मदेरणा के दौहित्र राघवेन्द्र मिर्धा का नाम सामने आ रहा है। मिर्धा और मदेरणा परिवार कई दशकों तक किसान राजनीति का सशक्त चेहरा रहा है। ज्ञातव्य है कि राघवेन्द्र मिर्धा के परदादा स्वर्गीय बलदेवराम मिर्धा मारवाड़ में किसान चेतना के स्तंभ थे। उन्होंने आजादी से पूर्व देशी रियासतों के दौर में किसानों में जागृति का जो मंत्र फूंका, वह एक अनूठी क्रांति थी। तब से आजादी के छह दशक तक नागौर के कुचेरा का मिर्धा परिवार प्रदेश की किसान राजनीति का सिरमौर रहा।
जहां तक 40 वर्षीय युवा राघवेन्द्र मिर्धा की शख्सियत का सवाल है, लोग उनमें रामनिवास मिर्धा का गांभीर्य और परसराम मदेरणा का तेजस्व दोनों देखते हैं। राघवेन्द्र मिर्धा ने युवावस्था से किसानों के मर्म को समझने की गहराई से कोशिश की है और इस यात्रा में हजारों गांव-ढाणियों को सादगी से नापा है। उन्हें कांग्रेस की किसान राजनीति का एक भावी गंभीर हस्ताक्षर माना जाता है। ऐसे में, कांग्रेस के भीतर यह सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि अजमेर के संसदीय उपचुनाव में राघवेन्द्र मिर्धा के जरिये कांग्रेस किसान राजनीति में एक नयी जान फूंके, जिसकी आज कांग्रेस को सख्त जरूरत है। चूंकि प्रदेश में कांग्रेस का बड़ा लक्ष्य अगले वर्ष विधानसभा चुनाव जीतना है, ऐसे में कांग्रेस राघवेन्द्र मिर्धा को आगे लाकर प्रदेश के जाट वर्ग के वोटों को भी एकजुट कर सकती है, जो कि आज बंटता दिख रहा है।

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