छोटे चौधरी की नैया पार लगायेंगे नीतीश

संजय सक्सेना

संजय सक्सेना

गठबंधन की राजनीति के सहारे पूरे देश में बीजेपी का विकल्प बनने के लिये बिहार से बाहर जनाधार बढ़ाने को बेताब जनता दल (यूनाईटेड) नेता और बिहार के सीएम नीतीश कुमार को उत्तर प्रदेश में न समाजवादी पार्टी ने कोई तवज्जो दी और न बसपा ने हाथ रखने दिया, जिस कांग्रेस को महागठबंधन के सहारे बिहार विधान सभा में सम्मानजनक स्थिति हासिल हुई थी, उसने भी जदयू को ठेंगा दिखा दिया। सपा,बसपा और कांग्रेस के साथ दाल नही गलती देख, जदयू नेताओं ने छोटे-छोटे दलों को एक करके महागठबंधन का सपना देखना शुरू कर दिया,लेकिन यहां भी उसे सफलता हाथ नहीं लगी। ऐसे में यूपी मंे पैर जमाने के लिये हाथ-पैर मार रहे नीतीश और अपनी सियासी जमीन बचाने में लगे राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष छोटे चौधरी अजित सिंह बीच हुआ गठबंधन दोंनो ही नेताओं के लिये ‘डूबते को तिनके का सहारा’ साबित हो सकता है। इस गठबंधन की वजह से जाट बाहुल्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अन्य राजनैतिक दलों के सियासी समीकरण भी प्रभावी हो सकते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजीत सिंह से हाथ मिलाने के बाद जदयू नेता नीतीश कुमार पूर्वाचल में भी इसी तरह क्षेत्रीय ़क्षत्रपों के साथ हाथ मिलाकर नया दांव चल सकते हैं। इसके लिये कुछ छोटे-छोटे दलों के साथ जदयू नेताओं की बातचीत भी चल रही है।
बहरहाल, सूरत-ए-हाल यह है कि गठबंधन की राजनीति में माहिर नीतीश और अजित सिंह राष्ट्रीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए यूपी में सपा-बसपा से बड़ा दुश्मन बीजेपी को मानकर चल रहे हैं। इस दुश्मनी की जद में कहीं न कहीं रालोद से अधिक जेडीयू की सियासत और नीतीश की पीएम मोदी से अदावत छिपी हुई है। नीतीश और मोदी के बीच की अदावत मात्र दो उदाहरणों से समझी जा सकती है। 2014 के लोकसभा चुनाव से करीब डेढ़ वर्ष पूर्व तक ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) संयुक्त रूप से यूपीए को चुनौती देगा, उस समय एनडीए में नीतीश कुमार एक ऐसा चेहरा थे जिनको लोग विकास बाबू की संज्ञा देते थे और अल्पसंख्यको ंको भी उनके नाम पर कोई एतराज नहीं होता,लेकिन ऐन मौके पर बीजेपी मोदी के पीछे चल दी और नीतीश कुमार हाथ मलते रह गये। बुरी तरह से खीजे जदयू यानी नीतीश ने एनडीए से नाता तोड़ लिया और अपने दम पर लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली,परंतु मोदीमय देश में उनकी एक नहीं चली। नीतीश तिलमिला कर रह गये। उसी दिन से नीतीश ने मोदी को सबसे बड़ा दुश्मन मान लिया।
लोकसभा चुनाव के करीब साल भर बाद बिहार चुनाव हुए यहां नीतीश-लालू और कांग्रेस महागठबंधन के सामने मोदी का मैजिक नहीं चल पाया। इसी के बाद नीतीश अपने आप को देश का भावी पीएम समझने लगे और इसके लिये उन्होंने गैर भाजपाई दलों से हाथ मिलाने की कोशिश भी शुरू कर दी, लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, उड़ीसा में बीजू पटनायक, यूपी में मुलायम, माया, तमिलनाडु में जयललिता ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी। इसी के बाद से नीतीश यूपी में अपनी ताकत बढ़ा कर पूरे देश में गैर भाजपाई दलों के बीच एक संदेश देने में जुटे हुए हैं कि ‘नीतीश से बेहतर कोई नहीं।’
रालोद-जेडीयू गठबंधन के साथ यह भी तय हो गया है कि रालोद नेता और चौधरी अजित सिंह के पुत्र जयंत चौधरी गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। कहा यह भी जा रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोकदल के अलावा बीएस-फोर (बहुजन स्वाभिमान संघर्ष समिति) जैसे छोटे दलों का साथ मिलने से पश्चिम यूपी के साथ-साथ प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ को ताकत मिलेगी। पिछले कई चुनावों में कुछ खास नहीं कर पा रहे रालोद नेताओं के लिये भी यह गठबधंन किसी सियासी संजीवनी बुटी से कम नहीं होगा।
गठबधंन के बाद बागपत के बड़ौत में अजित सिंह ‘किसान मजदूर स्वाभिमान रैली’ में भारी भीड़ जुटा कर राजनैतिक पंडितों को अपनी ताकत का अहसास करा चुके है। बड़ौत रैली कामयाब होने के बाद रालोद नेता कहने भी लगे है कि प्रदेश में अब चौथा मोर्चा बनने का मार्ग प्रशस्त होगा। जनता बसपा, सपा और भाजपा से अलग विकल्प चाहती है। जद यू-रालोद गठजोड़ सशक्त विकल्प साबित होगा।किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह व समाजवादी नेता और चिंतक डा.राम मनोहर लोहिया की विचारधारा के लोंगो को एकजुट करने के पहले सफल प्रयास के बाद नीतीश-अजित को उम्मीद है कि उनका चौथा मोर्चा बनाने का सफर धीरे-धीरे बढ़ता और बड़ा होता जायेगा। इसी क्रम में पूर्वाचल,अवध व अन्य क्षेत्रों में नीतीश कुमार व अजित सिंह की संयुक्त रैलियां होगी और इन रैलियों में स्थानीय छोटे दलों को भी साथ लाया जाएगा। बस फर्क इतना होगा कि जहां पश्चिमी यूपी में अजित सिंह का चेहरा चमक रहा था, वहीं पूर्वांचल में नीतीश कुमार अपने चेहरे को ज्यादा चमकाने की कोशिश में रहेंगे। बिहार से लगा होने के कारण पूर्वांचल में न केवल बिहारियों की अच्छी खासी तादात है, बल्कि बोलचाल, खानपान और संस्कृति में भी काफी समानता है। बिहार और पूर्वाचल के सियासी समीकरण करीब एक जैसे ही हैं।
बात 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी हालात की कि जाये तो आम चुनाव में यहां बीजेपी का परचम खूब लहराया था। अजित सिंह तक अपनी सीट नहीं बचा पाये थे। फिर भी अब हालात काफी बदल चुके हैं। पश्चिमी उप्र को चुनावी नजरिए अपने लिये अनुकूल मान रही भाजपा के लिए रालोद-जेडीयू की सफल बड़ौत रैली खतरे की घंटी साबित हो सकती है ? लेकिन बीजेपी इसे गंभीरता से नहीं ले रही है। वह कहती है कि जाट वोटर हों या फिर मीणा, राजपूत या अन्य बिरादरियां वह देख चुकी हैं कि मुजफ्फरनगर दंगों के समय सपा राज में उनके साथ किस तरह का सौतेला व्यवहार हुआ था। अजीत सिंह तक जाट लोंगो के जख्मों पर मरहम लगाने नहीं आये थे। ऐसे में सपा की बी टीम जैसी रालोद-जेडीयू को वह अपना अमूल्य वोट देकर अपने लिये नई मुसीबत मोल नहीं लेंगे।
खैर, बीजेपी वाले कुछ भी कहें, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि अगर पश्चिमी यूपी में रालोद मजबूत होगा तो बीजेपी को पश्चिमी उप्र में गत लोकसभा चुनाव जैसा जीत का सौभाग्य नहीं मिलेगा। गठबंधन द्वारा चौधरी चरण सिंह के पौत्र जयंत चौधरी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर उतारने से जाटों का झुकाव भाजपा से कम हो सकता हैै। इसके अलावा रालोद अपनी पुरानी हरित प्रदेश की मांग को एक बार फिर हवा देकर भाजपा-सपा को कटघरे में खड़ा करने को मजबूर करेगा, जबकि उक्त दोंनो ही दल हरित प्रदेश के पक्ष में नहीं है। जेडीय-रालोद और बीएस-फोर के गठबंधन से जाट-कुर्मी व पासी गठजोड़ की संभावना को भी बल मिलेगा।
नीतीश-अजीत का गठबंधन चुनाव बाद स्थिति पर भी नजर रखे हुए है। इसी लिये बड़ौत की स्वाभिमान रैली में दिग्गज नेताओं ने बीजेपी,मोदी और सपा को तो जमकर कोसा गया, किंतु यह नेता कांग्रेस पर हमला करने से गुरेज करते रहे। स्वाभिमान रैली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि वह फरवरी-मार्च से अजित सिंह के साथ मिलकर गठबंधन की रूपरेखा तैयार कर रहे थे, जो अब साकार हुई है। उन्होंने जयंत को होनहार नेता बताते हुए खुद को चौधरी चरण सिंह का शागिर्द बताया। साफ किया कि उप्र में परिवर्तन का मतलब सपा और बसपा का सत्ता में आना-जाना माना जाता है, जबकि इस बार रालोद-जदयू गठबंधन ही सरकार तय करेगा। नीतीश ने केंद्र सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी, कृषि नीति, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एवं मेक इन इंडिया को लेकर हमला बोला तो रैली में जुटी भीड़ से उत्साहित नीतीश ने घोषणा कर दी कि विधानसभा चुनाव के बाद रालोद-जदयू गठबंधन की सरकार बनती है तो उप्र में भी शराबबंदी लागू की जाएगी।
लब्बोलुआब यह है कि नीतीश-अजीत की एकता के साथ यूपी में गठबंधन के लिये हाथ-पैर मार रहे नीतीश ने पहला पड़ाव हासिल कर लिया है। इसके साथ ही चौथे मोर्चे की भी चर्चा शुरू हो गई है। यह गठजोड़ करीब सौ विधान सभा सीटों पर चुनावी मुकाबला चौतरफा बना सकता है, जहां जीत-हार का अंतर काफी छोटा होगा, और बाजी कभी भी पलट जाने का भय सभी दलों के नेताओं को सताता रहेगा।

संजय सक्सेना,लखनऊ
मो-7499041656
342!13 नौबस्ता,लखनऊ-3

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