संकीर्णता नहीं, स्वस्थ राजनीतिक मुद्दें हो

lalit-gargमुंबई में पिछले दो सप्ताह से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बाहर से आकर बसे और कारोबार कर रहे लोगों के खिलाफ हिंसक आंदोलन चला रही है, उन्हें खदेड़ रही है, उनके रोजी-रोटी को बाधित कर रही है, इस तरह अपनी राजनीति को मजबूत करने की सोच एवं रणनीति लोकतांत्रिक दृष्टि से कत्तई उचित नहीं है। देश में जातिवाद और रंगभेद आम समस्या है और हमारे लोग इसी के शिकार होते हैं। बढ़ते विस्थापन के कारण देश में कई जातियां-जनजातियां प्रवासी मजदूर बनने के लिए अभिशप्त हैं। वे चाहे बिहारी हों या ओडिया भाषी या झारखंडी, बंगाली, नेपाली सभी को भारत के महानगरों में दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है, उनके साथ न केवल बेगानों जैसा व्यवहार किया जाता है बल्कि उनको हिंसक तरीके से महानगरों से खदेड़ने की कोशिश की जाती है, जो असंवैधानिक होने के साथ-साथ अलोकतांत्रिक भी है। मुंबई विभिन्न समुदायों, जातियों, प्रान्तों और उनकी संस्कृतियों और परंपराओं का समन्वय स्थल है, भारत की विविधता में एकता का प्रतीक है। इस गौरवमय संस्कृति एवं छवि को धुंधलाने की कोशिशों को नाकाम किया जाना जरूरी है। मुंबई में बाहरी लोगों के साथ जो हुआ, या हो रहा है वह बहुत बुरा है, निन्दनीय है और विडम्बनापूर्ण है।
मुंबई में इन दिनों बाहर से आकर बसे और कारोबार कर रहे लोगों पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना कहर बरपा रही है। उसके कार्यकर्ता पटरी पर रेहड़ी लगाने वालों, फेरी वालों को मार-पीट रहे हैं, उन्हें वापस जाने को कह रहे हैं। इस बीच फेरीवालों के समर्थन में उतरे कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर भी मनसे कार्यकर्ताओं ने हिंसक हमले किए। इस क्रम में उन्होंने बाहरी लोगों का समर्थन कर रहे अभिनेता नाना पाटेकर को भी आड़े हाथों लिया। प्रश्न है कि मनसे को यह अधिकार किसने दिया? प्रश्न यह भी है कि वहां की सरकार चुपचाप यह सब क्यों होने दे रही है? मनसे मुंबई पुलिस को कैसे चेतावनी दे सकती है? इस तरह की दादागिरी एवं तनाशाही प्रवृत्ति लोकतंत्र का मखौल है, कानून और व्यवस्था का मजाक है।
एक बार पुुलिस को चेतावनी देकर खुद मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा बाहरी प्रांतों से आकर यहां फेरी लगाने, रिक्शा वगैरह चलाने वालों को हटाने की कार्रवाई किया जाना, किस तरह से उचित एवं लोकतांत्रिक माना जा सकता है? लेकिन मुंबई में इस तरह की दुखद घटनाएं हो रही है, मनसे के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए और फेरी, खोमचा लगाने वालों का सामान फेंकना, तोड़-फोड़ और उनके साथ मार-पीट करना शुरू कर दिया। हालांकि शिवसेना और मनसे के कार्यकर्ता ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं। चूंकि उनकी पूरी राजनीति मराठी अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के संकल्प से जुड़ी है, इसलिए वे मौका पाकर जब-तब बाहरी लोगों के खिलाफ हिंसक आंदोलन शुरू कर देते हैं। रविवार को मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने एक बार फिर यह कह कर अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और मराठी भावना को भुनाने का प्रयास किया कि जब तक बाहरी लोगों को यहां से भगा नहीं दिया जाता, महाराष्ट्र के लोगों को उनका हक हासिल नहीं हो पाएगा।
अपने राजनीतक धरातल को मजबूत एवं राजनीतिक स्वार्थों की रोटियां सेंकने के लिये बाहरी लोगों के साथ हिंसा करके उन्हें अपने अपने क्षेत्रों में लौट जाने को विवश करना विडम्बनापूर्ण त्रासद स्थितियां हैं। अपने ही वतन में बेवतन एवं बेगानों जैसा व्यवहार क्यों? लोकतंत्र के विचार को प्रभावी होने के लिए एकदेशिकता काफी नहीं, सार्वदेशिकता और अन्तर्राष्ट्रीयतावादी चेतना के बिना वह अर्थपूर्ण नहीं हो सकती। यह आज समझना तो और भी आवश्यक है कि लोकतंत्र की सफलता राष्ट्रवाद के संकुचित दायरे में नहीं हो सकती। मानवाधिकार के सिद्धांत ने कई क्षेत्रों में राष्ट्र की सीमाओं को अप्रासंगिक कर दिया है। फिर अपने ही देश में अपने ही देश के नागरिकों के साथ यह भेदभाव कब तक?
दरअसल, जब से शिव सेना दोफाड़ हुई है, दोनों घटकों के बीच मराठी अस्मिता की राजनीति कुछ अधिक आक्रामक हुई है। मनसे अपने को शिव सेना से अधिक मराठी मानुस की हितैषी साबित करने की कोशिश करती है। कुछ महीने पहले राज ठाकरे ने इसी तरह बाहरी प्रदेशों से आकर मुंबई में रिक्शा चलाने वालों को बाहर खदेड़ने के लिए आंदोलन चलाया था। हालांकि अब महाराष्ट्र के लोग भी शिव सेना और मनसे की संकीर्ण राजनीति को समझ चुके हैं, इसलिए उनके आंदोलनों का बहुत असर नहीं दिखाई देता, पर हैरानी की बात है कि उनके कार्यकर्ताओं के खिलाफ कभी कड़े कदम नहीं उठाए जाते। किसी भी शहर या राज्य से बाहरी लोगों को खदेड़ना या परेशान करना संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक ढांचे के विरुद्ध है। ऐसा नहीं कि यह बात शिव सेना और मनसे के लोग नहीं जानते, पर वे इसी तरह बाहुबल के आधार पर अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास करते आए हैं, इसके लिये वे लोगों को विनाश की विध्वंसकारी आग में धकेलते हैं। इससे बाहरी लोगों का जीवन अशांत, असुरक्षित, वहशत एवं दहशत के विषाक्त वातावरण सना हो जाता है। सद्भावना जख्मी हो जाती है, विविधता में एकता धुंधली होती है, सहजीवन आहत होता है। इस तरह का यह उनका राजनीति करने का एक ढर्रा बन चुका है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं में इस तरह की राजनीति की कोई जगह नहीं है।
मुंबई को देश की व्यावसायिक राजधानी, सपनों का शहर, ग्लैमर की नगरी आदि नामों से जाना जाता है। मुंबई एक जीवंत सांझा संस्कृति वाला और कभी न सोने वाला शहर है, जिसमें विभिन्न जातियों व धर्मों के और अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग रहते हैं। इन लोगों के अलग-अलग खानपान, संगीत व साहित्य व विविध कामधंधे इस शहर को विविधताओं की नगरी भी बनाते हैं, यही इसकी ताकत भी है और पहचान भी। यह शहर कई अलग-अलग संस्कृतियों का मिलन स्थल है। इसकी संस्कृति के निर्माण में यहां रहने वालों और बाहर से आकर यहां बसने वालों दोनों का समान योगदान है। मुंबई एक ऐसा आईना है जिसमें बंगाल, महाराष्ट्र, आसाम, बिहार, औडिसा, मणिपुर, नागालैंड, हर प्रदेश को अपनी सूरत नजर आएगी। मुंबई में ऐसे स्थानों का एक बड़ा खजाना है जो शहर की अचंभित कर देने वाली विविधिता और उसकी समृद्ध विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन इस विविधता को खंडित करने का प्रयास किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
क्या कारण है कि जन्मभूमि को जननी समझने वाला भारतवासी आज भूख और अभावों से आकुल होकर महानगरों की ओर भागता है और वहंा जाकर उसे उपेक्षा के दंश झेलने पड़ते है, प्रताड़ित होना पड़ता है, खदेड़ा जाता है। क्या कारण है कि शस्य श्यामला भारत भूमि पर आज अशांति, आतंक, अलगाव, भूख और हिंसा का ताण्डव हो रहा है? कारण है -शासन, सत्ता, संग्रह और पद के मद में चूर संकीर्ण राजनीति, जिसने जनतंत्र द्वारा प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग किया और जनतंत्र की रीढ़ को तोड़ दिया है। सरकारें हैं-प्रशासन नहीं। कानून है–न्याय नहीं। साधन हंै-अवसर नहीं। राजनीतिक स्वार्थ की भीड़ में राष्ट्रीय चरित्र खो गया है। उसे खोजना बहुत कठिन काम है। बड़े त्याग और सहिष्णुता की जरूरत है। उसे खोजने के लिए आंखों पर से जातीयता, क्षेत्रीयता, भाषा और साम्प्रदायिकता का संकीर्ण काला चश्मा उतारना होगा। विघटनकारी प्रवृत्तियों को त्याग कर भावात्मक एकता के वातावरण का निर्माण करना होगा। विघटन के कगार पर खड़े राष्ट्र को बचाने के लिए राजनीतिज्ञों को अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागना होगा।
यह जाहिर है कि जबसे भाजपा ने अपने दम पर चुनाव जीता और सरकार बनाई है, शिव सेना और मनसे एक तरह से अलग-थलग पड़ गई हैं। उन्हें अपना जनाधार बढ़ाने की चिंता सताने लगी है, इसलिए भी वे जब-तब कभी सरकार को घेरने के मकसद से, तो कभी मराठी भावना को भुनाने की मंशा से अपने कार्यकर्ताओं को आन्दोलन के लिए उकसाती रहती हैं। पर इस हकीकत से उन्हें आंख नहीं चुराना चाहिए कि जिस दमखम और रणनीति के तहत बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में अपना सिक्का जमाया था, अब उसे शिव सेना और मनसे के लिए बहुत देर तक भुनाना संभव नहीं है। विधानसभा और फिर कुछ नगर निकाय चुनावों में महाराष्ट्र के लोग इस बात का संकेत भी दे चुके हैं। इसलिए लोकतांत्रिक ढांचे को क्षत-विक्षत करने के बजाय अगर वे स्वस्थ राजनीतिक मुद्दों पर अपना जनाधार मजबूत करने का प्रयास करें तो शायद वे अपने अस्तित्व को बचाए रख सकती हैं। यही इन पार्टियों के इतिहास की दृष्टि प्रासंगिक होगा और ऐसा करके ही वे अपने गौरव को अक्षुण्ण रख पाएंगी। बाहरी मजदूरों की इज्जज एवं उम्मीद के पंखों को काटने की बजाय उन्हें खुला आसमान दिया जाये, यही इन बिखरी एवं टूटती पार्टियों के लिये संभावनाभरी उडान हो सकती है।
(ललित गर्ग)
60, मौसम विहार, तीसरा माला, डीएवी स्कूल के पास, दिल्ली-110051
फोनः 22727486, 9811051133

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