भारत में लोकसभा चुनाव का इतिहास

-बाबूलाल नागा- भारतीय लोकतंत्र को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। आगामी 16वीं लोकसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। मुख्य निर्वाचन आयोग ने देश में आम चुनाव की तारीखों की मुनादी कर दी है। देश की आजादी के बाद जब तक 15 आम चुनाव हो चुके हैं। वर्ष 1952 से आज तक हुए लोकसभा चुनावों के इतिहास पर डालते हैं एक नजर।

बाबूलाल नागा
बाबूलाल नागा

देश में पहली बार 1952 में लोकसभा का गठन हुआ । पूरे भारत में 44.87 प्रतिशत की चुनावी भागीदारी दर्ज की गई। पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। जी बी मावलंकर पहली लोकसभा के अध्यक्ष बने। पहली लोकसभा में 677 (3,748 घंटे) बैठके हुईं। यह अब तक हुई बैठकों की उच्चतम संख्या है। इस लोकसभा ने 17 अप्रैल, 1952 से 4 अप्रैल 1957 तक अपना कार्यकाल पूरा किया। दूसरी लोकसभा का गठन वर्ष 1957 में हुआ। पहली लोकसभा यानी 1952 की अपनी सफलता की कहानी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1957 में आयोजित हुए दूसरे लोकसभा चुनावों में भी दोहराने में कामयाब रही। कांग्रेस के 490 उम्मीदवारों में से 371 सीटें जीतने में कामयाब रहे। पंडित जवाहरलाल नेहरू की सत्ता में वापसी हुई। 11 मई , 1957 के चुनावों में निर्दलीयों को मतदान का 19 प्रतिशत प्राप्त हुआ। दूसरी लोकसभा ने 31 मार्च 1962 तक का अपना कार्यकाल पूरा किया। तीसरी लोकसभा अप्रैल 1962 में बनाई गई थी। तीसरी बार पंडित जवाहरलाल नेहरू की सत्ता में वापसी हुई। 11 मई, 1957 को एम अनंथसायनम आयंगर को नई लोकसभा का अध्यक्ष चुना गया। 1957 के चुनावों में निर्दलीयांे को मतदान का 19 प्रतिशत प्राप्त हुआ। दूसरी लोकसभा ने 31 मार्च 1962 में बनाई गई थी। तीसरी बार पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने। वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। दिल का दौरा पड़ने से 27 मई, 1964 को उनका निधन हो गया। उनकी मौत के बाद 2 सप्ताह के लिए वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता गुलजारीलाल नंदा ने उनकी जगह ली। कांग्रेस द्वारा लालबहादुर शास्त्री को नया नेता चुने जाने तक उन्होंने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम किया। शास्त्री के देहांत के बाद रिक्त स्थान के कारण कांग्रेस एक बार पुनः नेताविहीन हो गई। नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक बार फिर गुलजारीलाल नंदा को एक महीने से कम समय के लिए कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया। इंदिरा, शास्त्री जी के मंत्रिमंडल में सूचना एवं प्रसारण बनीं। चौथी लोकसभा का गठन वर्ष 1967 में हुआ। 13 मार्च 1967 को इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। इंदिरा ने दिसंबर 1970 तक सीपीआई (एम) के समर्थन से एक अल्पमत वाली सरकार को चलाया। वे आगे अल्पमत की सरकार नहीं चलाना चाहती थीं इसलिए उन्होंने चुनावों की अवधि से 1 वर्ष पहले मध्यावधि लोकसभा चुनावों की घोषणा कर दी। इसके साथ ही देश अपने पांचवंे आम चुनावों के लिए तैयार था।
वर्ष 1971 मंे पांचवीं लोकसभा के लिए देश में चुनाव हुए। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को भारी बहुमत से जीत दिलाई। ‘गरीबी हटाओ’ के चुनावी नारे के साथ प्रचार करते हुए वे 352 सीटों के साथ सत्ता में वापस आईं। 1971 में इंदिरा गांधी ने भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान साहसिक निर्णय लिया जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश बना। इस युद्ध में भारत की जीत हुई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 जून 1975 को चुनाव भ्रष्टाचार के आधार पर इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को अवैध ठहरा दिया। इस्तीफे के बजाय, इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी और पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया। आपातकाल मार्च 1977 तक चला और 1977 में आयोजित चुनावों में जनमोर्चा नाम के पार्टियों के गठबंधन से इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा। ऐसा पहली बार हुआ था, जब कांग्रेस को एक गंभीर हार का सामना करना पडा था। कांग्रेस सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा 1977 के छठी लोकसभा चुनावों में मुख्य मुद्दा था। राष्ट्रीय आपात काल के दौरान 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक नागरिक स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया गया था और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने व्यापक शक्तियां अपने हाथ में ले ली थीं। 23 जनवरी को इंदिरा गांधी ने मार्च में चुनाव कराने की घोषणा की। कांग्रेस को स्वतंत्र भारत में पहली बार चुनावों में हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई ने 298 सीटें जीतीं। देसाई 24 मार्च को भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। सातवीं लोकसभा का गठन 1980 में हुआ। कांग्रेस और आपातकाल के खिलाफ जनता के गुस्से पर सवार होकर जनता पार्टी सत्ता में आई लेकिन इसकी स्थिति कमजोर थी। लोकसभा में पार्टी की 270 सीटें थी और सत्ता पर उसकी मजबूत पकड़ नहीं थी। 1979 में मोरारजी देसाई ने संसद में विश्वास मत खो दिया और इस्तीफा दे दिया। चरणसिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में जून 1979 में शपथ ली। कांग्रेस ने संसद में सिंह के समर्थन का वादा किया लेकिन बाद में पीछे हट गई। चरणसिंह ने जनवरी 1980 में चुनाव की घोषणा कर दी। कांग्रेस ने लोकसभा में 351 सीटें जीती और सत्ता में वापसी की। आठवीं लोकसभा का गठन 1984 में हुआ। 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने कांग्रेस के लिए ऑक्सीजन का काम किया। इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद लोकसभा को भंग कर दिया गया और राजीव गांधी ने अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। नवंबर 1984 के लिए चुनाव की घोषणा कर दी गई। इस चुनाव में कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की। पार्टी ने 409 लोकसभा सीटें जीतीं।
नौवीं लोकसभा के लिए 1989 में चुनाव हुए। ये आम चुनाव कांग्रेस से जूझ रहे कांग्रेस के युवा नेता राजीव गांधी के नेतृत्व में लड़े गए। बोफोर्स कांड, पंजाब में बढ़ता आतंकवाद, एलटीटीई और श्रीलंका सरकार के बीच गृह युद्ध उन समस्याओं में से कुछ थी, जो राजीव गांधी की सरकार के सामने थीं। पांच पार्टियों वाला नेशनल फ्रंट भी चुनावी मैदान में था। 1989 का आम चुनाव 2 चरणों में आयोजित हुआ। नेशनल फ्रंट की जीत हुई। उसने वाममोर्चा और भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। विश्वनाथ सिंह भारत के दसवें प्रधानमंत्री बने और देवीलाल उपप्रधानमंत्री। उन्होंने 2 दिसंबर 1989 से 10 नवंबर 1990 तक कार्यभार संभाला। भाजपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सिंह ने विश्वास मत हारने के बाद इस्तीफा दे दिया। चंद्रशेखर 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए। उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी बनाई। उन्हें बाहर से कांग्रेस का समर्थन मिला और वे भारत के 11वंे प्रधानमंत्री बने। 6 मार्च, 1991 को इस्तीफा दे दिया। वर्ष 1991 में 10वीं के लिए मध्यावधि चुनाव थे। पिछली लोकसभा को सरकार के गठन के सिर्फ 16 महीने बाद भंग कर दिया गया था। 20 मई को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मतदान के पहले दौर के एक दिन बाद हत्या कर दी गई। चुनाव के शेष दिनों को जून के मध्य तक लिए स्थगित कर दिया गया। अंत में मतदान 12 जून और 15 जून को हुआ। चुनावों के परिणामों के बाद एक त्रिशंकु संसद बनी। 21 जून को कांग्रेस के पीवी नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। वर्ष 1996 में 11 वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव परिणामों से एक बार फिर त्रिशंकु संसद बनी और 2 वर्ष तक राजनीतिक अस्थिरता रही जिसके दौरान देश के 3 प्रधानमंत्री बने। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में राष्ट्रपति ने भाजपा नेता अटलबिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला और संसद में क्षेत्रीय दलों से समर्थन पाने की कोशिश की। वे इसमें विफल रहे और 13 दिनों के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। जनता दल के नेता एचडी देवगौड़ा ने 1 जून को एक संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार का गठन किया। उनकी सरकार 18 महीने चली। इंद्रकुमार गुजराल ने प्रधामंत्री के रूप में अप्रैल 1997 में पदभार संभाला, जब कांग्रेस बाहर से एक नई संयुक्त मोर्चा सरकार का समर्थन करने के लिए सहमत हो गई। 11 वीं लोकसभा मुश्किल से डेढ़ साल चली। अल्पमत वाली इंद्र कुमार गुजराल की सरकार 28 नवंबर, 1997 को गिर गई। इसके बाद चुनावों की घोषणा की गई।
10 मार्च, 1998 को 12वींे लोकसभा का गठन हुआ। वरिष्ठ भाजपा नेता अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 9 दिन बाद शपथ दिलाई गई। 12 वीं लोकसभा केवल 413 दिन चली। 17 अप्रैल 1999 को वाजपेयी ने लोकसभा में विश्वास मत खो दिया। इसके फलस्वरूप उनकी गठबंधन सरकार ने इस्तीफा दे दिया। 26 अप्रैल को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने लोकसभा भंग कर दी और जल्द ही चुनाव कराने की घोषणा कर दी। भाजपा ने मतदान होने तक एक अंतरिम प्रशासन के रूप में शासन करना जारी रखा। 13वीं लोकसभा के लिए देश में चुनाव हुए। राजग को 298 सीटें मिलीं। वाजपेयी ने 13 अक्टूबर को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। राजग सरकार ने 1999 से 2004 तक अपने शासन के 5 साल पूरे किए। 14 वीं लोकसभा के लिए 20 अप्रैल से 10 मई 2004 के बीच 4 चरणों में चुनाव हुए। इस बार भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। 13 मई को भाजपा ने हार को स्वीकार किया। कांग्रेस ने अपने सहयोगियों के मदद से गठबंधन किया। इस गठबंधन को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) कहा गया। सोनिया गांधी ने नया प्रधानमंत्री बनने से इंकार करने के बाद पूर्व वित्तमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से यह दायित्व उठाने के लिए कहा। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली और वर्ष 2009 तक अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। मई,2009 में 15वीं लोकसभा के चुनाव के परिणामों की घोषणा की गई। कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) ने लोकसभा का नेतृत्व करने का जनादेश जीता। मीराकुमार लोकसभा अध्यक्ष बनीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दोबारा देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला।
(लेखक विविधा फीचर्स के संपादक हैं)
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