कभी लगे थे चार चाँद ज़िन्दगी मै

आज कुछ अंको ओर मुहावरो को मिला कर कविता करने का मन बना है देखती हूँ क्या बन पडे
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कामना मिश्रा
कामना मिश्रा
कभी लगे थे चार चाँद ज़िन्दगी मै
फिर कही नो दो ग्यारह हुये
चार दिन की आई चादनी रात
जुगनु चन्द फिर तारी हो गये
झूले हम बहुत सावन के झूले
भादो मै भीगे भीगे हम हो गये
सुलगती रेत् भी लगती थी दरिया
हम मोसम पे भी भारी हो गये
जुआ खेला ज़िन्दगी ने हम से
लो अब हम भी जुआरी हो गये
ग्यारस सी मै ढलना चाहा मैंने
तिथी बारस सी अचानक हो गई
गंगा तेरा पानी था अम्रत सदा से
जहा की नजरो से खारी हो गई
चिडाती क्या तारीक मुझे ईकत्तिसी
मेरी बत्तिसी ईकत्तिसी पे भारी हो गई
दो दूनी चार सी इस चाल मै
कामना अब सयानी हो गई
कामना मिश्रा

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