नैतिकता का पतन

प्रेम आनंदकर
प्रेम आनंदकर
पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर “मेरी बेटी, मेरा अभिमान”, “मेरा बेटा, मेरा अभिमान”, “मेरी पत्नी, मेरी ताकत” जैसे “अभिमान” वाली पोस्ट धड़ाधड़ चल रही है। हालांकि इन तीनों पर अभिमान करने और इनके प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करने में कोई हर्ज भी नहीं है। यह तीनों परिवार के सशक्त स्तम्भ हैं। लेकिन “मेरी पड़ोसन, मेरा अभिमान” जैसी पोस्ट देखकर बहुत अफसोस होता है। भले ही इस तरह की पोस्ट में पड़ोस में रहने वाली बहन, बेटी, भाभी, भतीजी, भांजी की जगह किसी हीरोइन या किसी महिला की फोटो होती है, किंतु सवाल यह उठता है कि ऐसी पोस्ट डालने वाले आखिर क्या कहना और बताना चाहते हैं। क्या इस तरह की पोस्ट डालना उचित है। क्या यह नैतिकता के पतन की श्रेणी में नहीं आता है। हम यह क्यों नहीं सोचते हैं कि यदि हमारा ही कोई पड़ोसी इस तरह की पोस्ट डाले तो क्या हम उसे सहन करेंगे। भले ही पोस्ट में पड़ोसी के नाम व फोटो का जिक्र ना हो, लेकिन क्या अपने पड़ोसी के बारे में इस तरह की पोस्ट डाली जानी चाहिए। माना कि फेसबुक सोशल मीडिया है और इस पर बोलने, लिखने व फोटो के साथ पोस्ट डालने की आजादी है, किंतु मेरी नजर में इस तरह की पोस्ट हमारे चरित्र को बयां करती है। मेरे प्रबुद्ध मित्र मेरी बात से सहमत होंगे या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता। फिर भी आपकी राय जानने की अपेक्षा रखता हूं।

-प्रेम आनन्दकर, अजमेर, राजस्थान।

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