उमराव जान, जिसे प्यार न मिला

कितने आराम से हैं कब्र में सोने वाले

कभी दुनिया में था फिरदौस में अब है मसकन

कब्र कैसी अहले वफा की है अल्ला-अल्ला

सबको गम जिसका है वह दोस्त है या दुश्मन।

वाराणसी के फातमान कब्रिस्तान में एक तरफ शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिलला खां आराम फरमां हैं तो दूसरी तरफ अपनी अदाओं जल्वों से हजारों को दीवाना बना देने वाली अवध की शान और फनकारी की जान उमराव जान ‘अदा’। अपने दौर की मशहूर व मारूफ तवायफ उमराव जान की कब्र उनकी अन्दरूनी जिन्दगी की तरह टूट-फूट चुकी है। किसी जमाने में उमराव के पिता नवाबों के कब्रों पर रोशनी किया करते थें मगर अफसोस आज उनकी साहब्जादी के कब्र पर सियापा छाया रहता है। फातमान में उमराव जान की कब्र की हालत उनकी हकीकी जिन्दगी से बेहतर नहीं है। टूटे-फूटे कब्र के सिरहाने लगे पत्थर पर उर्दू जबान में लिखा है- वफात उमराव बेगम लखनवी यौमे-जुमा 27 जिकदा 1359 हिजरी और उसके नीचे लिखे शेर भूले-भटके आने वालों से कब्र की हकीकी जिन्दगी से तआरूफ कराती है।

एक वह दौर था जब उमराव जान की अदाओं उनके जलवों के हजारों दीवाने हुआ करते थे। उनका हुस्न और उनके आवाज की खनक लोगों के दिलो-दिमाग पर राज किया करती थी। शहर में चारों तरफ उनके गाने की धूम रहती जब भी मुजरा होता हजारों-हजार आदमी टूट पड़ते। और आज एक दौर है कि उनका अन्जुमन वीरान पड़ा है। गुबार ही गुबार है शायद ही कोई शख्स हो जो भूले से उनकी कब्र पर शमां जला जाए या अकीदत के दो फूल चढ़ा जावे। अपनी कब्र में लेटी उमराव जान आज उतना ही तन्हा हैं जितनी तब थीं जब वह अपने चाहने वालों की भीड़ में उस शख्स को तलाशती रहतीं जो उनके अन्दर जी रहे एक औरत का दर्दख्वार बन सके । वाराणसी में उमराव जान का आना फिर उमराव जान बनने की वह दास्तान है जो वाराणसी के फातमान स्थित कब्र में उनके साथ ही दफन हो गयी जिसे न तो सिनेमाई परदे पर जगह मिल सकी न ही किसी इबारत में।

मुजफफर अली व जे0 पी0 दत्ता सरीखे फिल्मकारों ने उमराव जान के फनकारी के जादू के उसी हिस्से को सत्तर एम एम के परदे पर फिल्माया जो बिकाउ था और जो उन्हे दौलत व शोहरत दिला सके। उमराव के जादू को जब मुजफफर अली ने सत्तर एम एम की चमचमाती स्क्रीन पर साकार किया तो लोगों ने दांतों तले उंगलियां दबा ली थीं। सन् 1981 में प्रदर्शित 145 मिनट की इस हिन्दी-उर्दू भाषाई फिल्म ने किसी फनकार के जज्बात और उसके संघर्ष की गाथा को जिस शिद्दत से परोसा था उसके लोग आज भी कायल हैं। न होते हुए भी उमराव जान खुद का तमाशा बनाने वाले इन फिल्मकारों को इज्जत दौलत व शोहरत सब कुछ दिला गयीं।  शायद देना ही उनकी जिन्दगी का मकसद था पाना नहीं। उमराव जान के उस स्याह पहलू पर किसी की नजर नहीं पड़ी जो उनकी गुमनामी के आखीरी दिनों में उनके साथ गुजरी और आज भी वाराणसी में उनकी मौजूदगी का एहसास दिलाती है। आाखिर जिन्दगी का वह कौन सा तजुर्बा था जो उमराव जान को मोक्ष की नगरी काशी की तरफ खींच लाया और उम्र के आखीरी दिनों में यहीं की बनकर रह गयीं और इसी सरजमीं में दफन भी हुयीं। अमरीन से उमराव बनीं फैजाबाद की उस मासूम लड़की की बेबसी का तमाशा तो सेल्युलाइड के परदे पर तो सबने देखा मगर ढ़लती उम्र के बाद की कहानी शायद ही किसी को पता हो!

बात सन् 1857 की है। अंग्रेजों ने लखनउ में तबाही का निजाम कायम कर दिया। चारों तरफ लूट, खूंरेजी, कत्ल व जिना आम था। सब कुछ उजड़ गया। न राजे-रजवाड़ों का दौर रहा न महफिलों मुजरों का। इन सबके साथ चौक की महफिलें भी बेनूर हुईं। इन सभी के साथ उमराव जान की जिन्दगी में झूमकर नाचने वाली तवायफ भी उजड़ चुकी थी। एक सच उनके साथ हमेशा लगा रहता कि हजारों चाहने वालों की भीड़ में जिन्दगी का सफर तन्हा तय करने वाली उमराव हमेशा भटकती रहीं। जिन्दगी का हालात जिस किसी को भी उनके पास ले गया वह उससे उतना ही दूर होता चला गया। सबकी चहेती होते हुए भी वह किसी की ना हो सकीं। पहला मुजरा लखनउ के नवाब सुजाअत अली खां के लड़के की शादी में हुआ। उसी दिन नवाब सुल्तान शाह को दिल दे बैठीं। प्रेम परवान चढ़ा नवाब साहब रोज रात को मिलने आते। एक रात मजे की सोहबत में थें; शेरो-शायरी का दौर चल रहा था कि एक बदमाश आ धमका उसने उमराव जान को जबरदस्ती ले जाने लगा काफी समझाने के न माना। नवाब साहब से देखा न गया उन्होने उस बदमाश को गोली मार दिया। चूंकि नवाब साहब को अपने इज्जत की ज्यादा पारवाह थी इसलिए उन्होने आना ही छोड़ दिया। उमराव ने कई बार खबर भेजे चुपके से कहीं मिलते रहे मगर एक दिन सिलसिला ऐसा टूटा कि वह खुद टूट गयी। दिन कटे मगर बिना लज्जत के जिन्दगी का सफर चल रहा था कि एक दिन ठहराव सा आ गया। फैज अली का आना और उमराव का उससे लगाव ने उमराव को घर बसाने का सपना खिाया मगर तवायफ किसी के घर की जीनत नहीं बन सकती शायद यह उमराव भूल गयी। लखनउ से उन्नाव जाने था रास्ते में गढ़ी के राजा शम्भूनाथ सिंह को उसकी तलाश थी पता चला और राजा ने उसे घिरवा लिया फैज तो भाग निकला मगर उमराव फंस गयी। सारा सपना टूट गया घर बसाने का। राजा शम्भूनाथ सिंह शायरों की कद्र करते थे सो उमराव का सारा हाल जानने के बाद रिहा कर दिया। अब उमराव ने तन्हाई अख्तियार कर लिया। मुजरा से दिल फिरता गया। धीरे-धीरे नाच गाने से सुब्दोस हो गयीं। फिर हज को चली गयीं। वापसी के बाद कुछ दिन लखनउ में रही अचानक एक दिन लखनउ छोड़ कर वाराणसी आ गयीं।

सब कुछ उजड़ता चला गया। उम्र की ढ़लती रौ में वह काशी आ गयीं। यही दालमण्डी के पास पत्थर गली में मकान लेकर रहने लगी। अनपे उम्र के बचे दिन उमराव ने यही काटे। जानकार बताते हैं कि उमराव जान वाराणसी में न तो महफिलें सजातीं और न ही मुजरा करतीं। सिर्फ नमाज पढ़तीं कुरान की तिलावत करतीं व अनपे रब से माफी-तलाफी में दिन गुजारा करतीं।  बहुत कम लोग जानते हैं कि उमराव जान तवायफ के साथ अच्छी शायरा भी थीं। वह ‘अदा’ उपनाम से शायरी करती। सुल्तान साहब से इश्क होने पर लिखा था-

इश्क में हसरते दिल का निकलना क्या

दम निकलने में भी कमबख़्त मजा आता है।

उमराव जान के मशहूर होने के पीछे मुजरा के साथ-साथ उनकी शायरी का कमाल था। गढ़ी में शम्भूनाथ सिंह से रिहाई पाने पर लिखा था-

कैदी उल्फते सैययाद रिहा होते हैं

आज हम बा दिले नाशाद रिहा होते हैं

ऐ ‘अदा’ कैदे मुहब्बत से से रिहाई मालूम

कब असीरे गमे सैयाद रिहा होते हैं।

अपनी बेबस व खानाबदोश जिन्दगी पर उमराव ने लिखा-

1. सुन चुके हाल तबाही का मेरे और सुनो

 अब तुम्हे कुछ तकरीर मजा देती है।

 2. किसको सुनाऐं हाल-ए-दिलेजार ऐ ‘अदा’

 आवारगी में हमने जमाने की सैर की।

 3. मरने के दिन करीब हैं शायद ऐ हयात

 तुझसे तबीयत अपनी बहुत सीर हो गई।

umrao

 जिन्दगी के उस दौर में जब चमक-दमक व रंगीनीयों से उमराव का दिल भर गया। नाचने व गाने से रूह उब गया। दुनियां से दिल उचट गया तो उन्होने गुमनामी की जिन्दगी पसंद किया। तवायफ की तरह न रहकर औरत की तरह जीना चाहा। जब सांसों ने जिस्म का साथ छोड़ दिया और रूह परवाज कर गया तो फातमान स्थित कब्रिस्तान में उन्हे दफनाया गया और साथ ही उमराव जान के जिन्दगी का आखीरी हिस्सा अन्धेरे में रह गया। उपनर बनीं फिल्मों को देख कर लोग भले ही आंखें नम कर लेते हैं। एक तवायफ के अन्दर छिपी एक औरत का दर्द उन्हे सोचने पर मजबूर कर देता है मगर बनारस में उनकी कब्र का कोई पुरसेहाल नहीं है।

मुठ्ठियों में खाक लेकर दोस्त आए वक्त-ए-दफन

जिन्दगी भर के मोहब्बत का सिला देने लगे।

(लेखक एम अफसर खां सागर स्वतंत्र पत्रकार है)
www.aawaz-e-hind.in से साभार 

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