अगर गैर सिंधी का प्रयोग हुआ तो गहलोत होंगे नंबर वन

dharmendra gehlot 120कानाफूसी है कि अव्वल तो शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का टिकट कटने का कोई कारण तो नजर नहीं आता, उनकी चुनावी तैयारी भी पूरी है, मगर बावजूद इसके इस बार भी गैर सिंधी दावेदार टिकट जरूर मांगेंगे। उसके लिए अंडरग्राउंड बाकायदा तैयारी चल रही है।
बताते हैं कि अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिवशंकर हेडा आगामी चुनाव में टिकट के लिए गणित बैठा रहे हैं। इसी प्रकार अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत भी भाजपा में लौट कर टिकट की ख्वाहिश रखते हैं। पिछले बार तो बहुत दमदार तरीके से उभर कर आए थे। अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत पर किसी की नजर नहीं है, मगर अंदर का सच ये है कि उनकी भी पूरी तैयारी है। उन्होंने पिछले दिनों मजाक मजाक में पार्टी कार्यकर्ताओं के एक स्नेह मिलन में इसका इशारा भी किया। उनके लिए माली समाज गुपचुप लामबंद हो रहा है, जो कि प्रो-बीजेपी माना जाता है। मालियों के वोट विशेष रूप से अजमेर दक्षिण में हैं, जो कि महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल की लगातार तीन बार जीत में अहम भूमिका अदा कर चुके हैं। उनके ही दम पर गहलोत प्रबल दावेदार बन जाएंगे। बस फर्क ये है कि वे खुल कर टिकट मांगने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि वे देवनानी के प्रमुख सेनापति हैं। उनके सामने टिकट मांगना नैतिकता के लिहाज से उपयुक्त नहीं होगा। मगर इतना तय है कि अगर देवनानी का टिकट कटा और कोई और सिंधी दावेदार समझ में नहीं आया तो हो सकता है कि इस बार भाजपा गैर सिंधी का प्रयोग करे। इसके पीछे भाजपा की यह सोच भी हो सकती है कि सिंधी मतदाता तो उसकी जेब में है, वो कहां जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो स्वाभाविक रूप से देवनानी गहलोत को ही सपोर्ट करेंगे। इसके अतिरिक्त संघ भी गहलोत का साथ देगा। कदाचित मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को गहलोत पसंद न भी हों, मगर अजमेर उत्तर की सीट का फैसला तो संघ ही करेगा। हेडा भी वैश्य समाज के दम पर टिकट मांगेंगे, मगर उनकी तुलना में गहलोत को अधिक ऊर्जावान होने का लाभ मिल सकता है। कोशिश तो शेखावत भी कम नहीं करेंगे, मगर संघ उनका साथ देगा, इसमें संदेह है। इसके अतिरिक्त अजमेर भाजपा के भीष्मपितामह रहे औंकार सिंह लखावत भी आड़े आएंगे। उनका पुराना हिसाब किताब है। लखावत के पुत्र उमरदान लखावत जब जीसीए छात्र संघ के अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे थे तो शेखावत ने अलग संगठन के बैनर पर प्रत्याशी उतारा, नतीजतन उमरदार हार गए। जब जब शेखावत का जिक्र आता है तो उनके विरोधी वह किस्सा उठा कर ले आते हैं। खैर, गैर सिंधियों में और भी कई दावेदार हो सकते हैं, मगर प्रमुख रूप से तीन ही हैं। कुछ ब्राह्मण भी दावेदार बन कर उभर सकते हैं। औरों का जिक्र करके उन्हें अनावश्यक रूप से दावेदारों की सूची में लाना प्रायोजित माना जाएगा।

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