साधु-संत भी लोकेषणा से मुक्त नहीं

तेजवानी गिरधर
तेजवानी गिरधर
इसमें कोई शक नहीं कि साधु-संत हमारे लिए सम्माननीय हैं। वे समाज का मार्गदर्शन करते हैं और आमजन में धर्म के प्रति आस्था कायम रखे हुए हैं और उसी वजह से इस अर्थ प्रधान व मतलबी दुनिया में संस्कार व नैतिक जीवन मूल्य मौजूद हैं, मगर वे भी वैसी ही लोकेषणा रखते हैं, जैसी कि हम लोग रखते हैं। इसका नजारा हाल ही जयपुर में देखने को मिला, जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आगमन पर साधु-संतों का सम्मेलन किया गया।
इस मौके पर अमित शाह व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित अन्य नेताओं ने उनसे आशीर्वाद लिया। न केवल मीडिया ने ऐसे क्षणों को कैमरे में कैद कर यह दिखाया कि देखो किस प्रकार सत्ताधीश साधुओं के आगे नतमस्तक होते हैं, अपितु कुछ संतों ने भी अमित शाह व वसुंधरा को आशीर्वाद देते हुए खींचे गए फोटो सोशल मीडिया पर जारी किए। मीडिया की तो चलो ड्यूटी है कि वह समाज में जो कुछ चल रहा है, उसकी रिपोर्ट करे, मगर यदि संत भी ऐसे फोटोज का प्रचार-प्रसार करते हैं, तो इसका अर्थ ये है कि वे भी हमारी तरह लोकेषणा से मुक्त नहीं हैं। लोकेषणा भी ऐसी कि देखो कैसे सत्ता के शिखर पर बैठे नेता हमारे आगे शीश नवा रहे हैं। यानि कि जितना बड़ा नेता आशीर्वाद ले रहा है, उतना ही संत का स्टेटस बढ़ जाता है, कद बढ़ जाता है। अर्थात बड़े नेता को आशीर्वाद देना भी ब्रॉन्डिंग के काम आता है। इसका अनुमान इस प्रकार लगाया जा सकता है कि भविष्य में वे ही फोटोज आप संतों के ड्राइंग रूप में टंगे मिलेंगे। उनके शिष्य भी ऐसे फोटोज का प्रचार-प्रसार करते हैं कि देखो, अमुक बड़ा नेता हमारे गुरू के आगे झुक रहा है।
इसके विपरीत जैसी कि हमारी संस्कृति है, वह यह दर्शाती है कि हमारे साधु-संत सभी प्रकार की एषणाओं से मुक्त हैं। वे इसी कारण हमारे लिए सम्मानीय हैं कि हम सभी तरह की एषणाओं से घिरे हुए हैं, जबकि हमारे आदर्श विरक्त हैं। उनके लिए छोटा-बड़ा एक समान है। सभी पर एक जैसी कृपा बरसाते हैं।
रहा सवाल राजनीतिज्ञों का तो वे इस कारण शीश झुकाते हैं क्यों कि या तो वाकई उनकी संतों के प्रति श्रद्धा है या फिर जनता को संदेश दे रहे होते हैं कि आप भी संतों का सम्मान करें। जबकि साइलेंट एजेंडा ये होता है जिस भी संत के आगे वे झुकें, उसके फॉलोअर्स में उनकी लोकप्रियता बढ़े। इसी कारण नेता लोग हर संत के आगमन पर भरी सभा में जा कर आशीर्वाद लेते हैं। यानि वोटों की खातिर यह प्रहसन किया जाता है। सच तो ये है कि कई बार संतों के ही शिष्य नेताओं से संपर्क कर उनसे आग्रह करते हैं कि उनके गुरू की सभा में आ कर आशीर्वाद लें। ऐसे शिष्यों में विशेष रूप से वे होते हैं, जो कि किसी न किसी राजनीतिक दल अथवा नेता के अनुयायी होते हैं और ये जताते हैं कि देखो अमुक संत और नेता तक उनकी पहुंच है।
लब्बोलुआब नेताओं की लोकेषणा तो समझ में आती है, मगर साधु-संत भी इससे मुक्त नहीं तो इसका ये अर्थ है कि वे भी संसार में रस ले रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि नेता ने सफेद कपड़े पहन रखे हैं और साधु ने गेरुआ। और चूंकि गेरुआ रंग हमारी श्रद्धा का प्रतीक है, इस कारण हम हर उस जगह झुक जाते हैं, जहां गेरुआ रंग होता है। मन में श्रद्धा हो न हो, हम भी इस वजह से झुक जाते हैं, क्योंकि हमारे इर्द-गिर्द अन्य झुक रहे होते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

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