हमारी तप-संस्कृति है संलेखना, इसे कैसे छोड़ दें…राष्ट्रसंत पुलक सागर

Pulak sagar maharajहमने न्याय व्यवस्था का सदैव सम्मान किया है। न्यायालय के प्रत्येक निर्देश को हमेशा सिर माथे लिया है। हमने न्यायपालिका को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ मानते हुए उसके सभी आदेशों एवं निर्णयों के प्रति पूर्ण सम्मान भाव रखा है, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट के ताजा निर्णय से मन व्यथित है। हम न्यायालय के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहे हैं लेकिन मन की पीड़ा और व्यथा को अभिव्यक्त कर रहे हैं। उक्त न्यायालय ने हमारी सदियों पुरानी संथारा प्रथा पर रोक लगाते हुए इसे आत्महत्या की श्रेणी में रखा है। हम इस निर्णय से न सिर्फ असहमत हैं बल्कि आत्मिक रूप से अत्यंत व्यथित हैं। हम सबका मन यही कह रहा है कि न्यायालय ने समझने में गलती की है।
अहिंसा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता पर शक, मुझे आश्चर्य होता है कि हमारा कानून देश में धर्म के नाम पर अभी भी चल रही मूक और निरीह पशुओं की बलि प्रथा पर अभी तक कोई रोक नहीं लगा पाया है, लेकिन जैन धर्म की संस्कृति की एक महत्वपूर्ण परंपरा संलेखना को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में ला खड़ा किया है। जैन धर्म / समाज अहिंसक समाज है। हिंसा के लिए इस धर्म में कोई स्थान नहीं है। न्यायालय के निर्णय से समग्र समाज का दुखी होना स्वाभाविक है। हम पर आत्महत्या का आरोप लगाकर अहिंसा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता पर उंगली उठाई गई है। भीष्म पितामह इच्छा मृत्यु का वरण करके समाज के लिए आदर्श बन सकते हैं। मात्र 9 वर्ष की आयु में संत ज्ञानेश्वर समाधि ले लेते हैं, उस पर कोई विवाद नहीं होता है और घर-घर पूजे जाते हैं। हिन्दू परंपरा में जल समाधि, अग्नि समाधि, भूमि समाधि आदि का वर्णन है और अभी तक कई साधु-संत ऐसी समाधियां करते आए हैं लेकिन उन पर कभी बवाल नहीं मचा और न ही माननीय न्यायालय ने उक्त समाधियों को नियम-विरुद्ध ठहराया। जैन धर्म में तो ऐसी समाधियों का कोई वर्णन नहीं है तो फिर हमारी पूर्ण-रूपेण शास्त्रोचित संलेखना परंपरा पर प्रश्न क्यों खड़े किए जा रहे हैं?
पहले धर्म की आड़ में होने वाले पशुओं के कत्लेआम को रोकें
मैं फिर कहूंगा कि कानून को पहले धर्म की आड़ लेकर कत्लेआम करने वालों पर अंकुश लगाना चाहिए। क्रूरता का सबसे बड़ा उदाहरण तो मंदिरों में बलिप्रथा के नाम पर पशु-पक्षियों की बलि देने की अब तक जारी कुपरंपरा ही है। मुझे बड़ा खेद है कि हमारी संलेखना परंपरा को आत्महत्या का नाम देने वाले मााननीय न्यायालय का इस ओर अभी तक कोई ध्यान नहीं गया! संलेखना को किसी भी दृष्टिकोंण से सती-प्रथा के समतुल्य नहीं माना जा सकता। यदि ऐसा होता तो जिस तरह राजा राममोहन राय के प्रयास से लार्ड विलियम बैंटिक ने सवा सौ वर्ष पूर्व सती प्रथा पर रोक लगाई थी, उसी समय या उसके बाद कोई विद्वान न्यायाधीश जैन धर्म की परंपरा संलेखना पर भी रोक लगा सकता था लेकिन सनातन भारतीय राजाओं से लेकर मुगल काल, ब्रिटिश काल और देश की स्वतंत्रता के बाद भी आत्मकल्याण की भावना रखने वाली इस महान जैन परंपरा को किसी ने नियमविकरूद्ध नहीं ठहराया लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने हमारी सर्वमान्य संस्कृति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।
आत्महत्या और संलेखना करने वाले की मानसिकता में भारी फर्क
मुझे जब न्यायालयों के निर्णय के बारे में बताया गया और उसके बाद देशभर के कई अखबारों और टीवी चौनलों के प्रतिनिधियों ने मुझसे प्रतिक्रिया देने को कहा तभी से मैं अपने शब्दों को काफी संयमित करने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन इस निर्णय के विरूद्ध अपने मन के आवेग को काबू करने में स्वयं को असमर्थ सा पा रहा हूं। मेरा यही कहना है कि पहले हमें आत्महत्या शब्द का ही विश्लेषण करना होगा। आत्महत्या करने वाले की मानसिकता और संलेखना करने वाले साधु या व्यक्ति की मानसिकता के अंतर के भेद को भली प्रकार समझना होगा। आत्महत्या क्षणिक आवेश में उठाया गया कदम है। आत्महत्या करने के लिए महीनों पहले से योजना नहीं बनाई जाती है। व्यक्ति आत्महत्या तभी करता है जब वह किसी अप्रिय बात को लेकर उद्धिग्न हो अथवा सब ओर से निराश होने के बाद जीने का कारण ही खत्म हो जाए अथवा कोई गलत काम करने पर समाज का सामना करने की हिम्मत खोने के बाद व्यक्ति मृत्यु का स्वमेव वरण करता है। वह होशो-हवास खोने के बाद ही यह अक्षम्य कदम उठाता है।
हमारी संलेखना पंरपरा इसके ठीक उलट है। यह तो आनंद-मृत्यु है जो अपने परिजनों, साथी साधुओं और समाज की जानकारी और उनकी उपस्थिति में होती है। कोई व्यक्ति संलेखना करने का निर्णय अच्छी तरह सोच-समझकर और होशपूर्वक ही लेता है। आत्महत्या को हमारे समाज में सदैव वर्जनीय माना गया है जबकि संलेखना का उल्लेख तो हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है। प्राचीनकाल में आचार्यों से लेकर कई अगणित साधु-संतों, मुनियों ने जीवन के अंतिम पहर में संलेखना कर आनंद मृत्यु का वरण किया और समाज सदैव से एैसे संत-मुनियों से समाज हित के लिए आत्मकल्याण और आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा ग्रहण करता रहा है। संलेखना से देश के लोगों को कभी आपत्ति नहीं रही। संलेखना समाधि करने वाला व्यक्ति खुशी-खुशी जीवन के परम सत्य मृत्यु को गले लगाता है। इससे न समाज का अहित होता है और न किसी व्यक्ति का। यह हमारी चिर-संस्कृति, गीता में भी आत्मा को अमर बताया
हमारी धार्मिक संस्कृति में भी विभिन्न स्थानों पर परोक्ष-अपरोक्ष रूप से संलेखना अथवा कुछ ऐसी ही मान्य परंपराओं की पुष्टि होती है। श्रीमद्भगवद्गीता में आत्मा को अजर-अमर माना गया है अर्थात शरीर का तो निधन होता है लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती। शरीर के जर्जर होने पर आत्मा तो केवल चोला बदल कर दूसरे शरीर को धारण करती है। मेरा निवेदन है कि संलेखना को राजनीतिक या सामाजिक मुद्दा न बनाया जाए। यह हमारी धार्मिक चिर-संस्कृति है, इससे छेड़छाड़ करने का अर्थ हमारी समस्त पुरातन महान संस्कृति को नियमविरूद्ध सिद्ध करने का प्रयास ही माना जाएगा। भारतीय संस्कृति में माना गया है कि व्यक्ति आयु से जीता है और आयु से मरता है, आयु पूर्ण होने पर व्यक्ति यदि स्वप्रेरणा से और आत्मकल्याण के भाव से अपने प्राण त्यागता है तो इसमें गलत कहां! संथारा या संलेखना करने वाला व्यक्ति मृत्यु की समीपता को सुनिश्चित जानकर धीरे- धीरे भोजन और पानी त्याग देता है। मृत्यु से पूर्व यदि व्यक्ति भोजन और पानी छोड़ देता है तो इसमें अनुचित क्या है? जो भोजन जीवन नहीं दे सकता है, उसे छोडऩे में क्या हानि है? मुझे तो इसमें कोई अधर्म नजर नहीं आता और न नियम-कानून का कोई उल्लंघन दिखता है। आत्महत्या के बाद परिवार बिलखता है लेकिन संथारा में इसके उलट होता है। परिवार यही मानता है कि व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन जीकर स्वेच्छा से भवबंधन से पार हो गया। संलेखना में मृत्यु जैसी जीवन की कठोर सच्चाई को भी आनंदोत्सव के रूप में ग्रहण किया जाता है।
4 मृत्यु को महोत्सव के रूप में स्वीकारना सिखाती है संलेखना
मैं ओशो रजनीश की विचारधारा या उनकी फिलॉसिफी से ज्यादा सहमत नहीं हूं लेकिन यहां उनकी एक बात का प्रसंगवश स्मरण करूंगा। वे मृत्यु को महोत्सव कहते थे। ओशो परंपरा में आज भी किसी अनुयायी की मृत्यु होने पर शोक नहीं बल्कि उत्सव मनाया जाता है। पुणे के आश्रम में लगभग 25 वर्ष पूर्व जब ओशो ने प्राण त्यागे तो उनके अनुयायी शोक-विलाप करने के बजाए पूरी रात उनके शव के इर्द-गिर्द नाचते-गाते रहे थे। ओशो रजनीश का जन्म एक जैन परिवार में हुआ था और मृत्यु को महोत्सव के रूप में स्वीकार करने की यह परंपरा शायद उन्होंने अपने मूल धर्म से ही सीखी थी। जैन धर्म की संलेखना परंपरा मृत्यु को महोत्सव के रूप में ही स्वीकार करने का संदेश देती है लेकिन यह संदेश उचित ढंग से शायद जयपुर तक नहीं पहुंच पाया…।
ऊपरी अदालत में पूरी तैयारी से रखें समाज का पक्ष
आत्महत्या महापाप है जबकि संलेखना तो तपस्या है और हमारी संस्कृति तपस्या को प्रधानता देती है। जैन संस्कृति में संपूर्ण जीवन तपस्या करने की सीख दी जाती है, यहां तक कि अंतिम संास तक तप करने की बात कही गई है। तपोप्रधान संस्कृति में इसी को तो संलेखना कहा गया है। जीवन की इच्छा, मृत्यु की इच्छा, सुख की इच्छा, इसी पर आधारित है संलेखना। तपस्या करने का अधिकार प्रत्येक साधक को है। यह भारत की संस्कृति है। इसे रोकने का न तो कोई विधान था और न है और न आगे हो सकता है। राजस्थान उच्च न्यायालय में हमारे कानून विशेषज्ञों ने लड़ाई को अच्छी तरह लड़ा है लेकिन जिस प्रकार का प्रतिकूल निर्णय आया है उसे देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि कहीं न कहीं कुछ चूक रह गई। हम अपनी बात को न्यायालय के समक्ष सही ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाए। अभी ऊपरी अदालत का दरवाजा हमारे लिए खुला हुआ है। मैं इस प्रकरण को देख रहे कानूनी जानकारों से यही कहूंगा कि वे संलेखना को नियमोचित एवं वैधानिक मान्य करने वाले सभी तथ्यों का नए सिरे से अध्ययन एवं विश्लेषण कर पूरी तैयारी के साथ ऊपरी अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट जाकर इस निर्णय को चुनौती दें। हम अपनी जगह सत्य, धर्म और ईमानदारी के पथ पर हैं, इसलिए मुझे पूर्ण विश्वास है कि हमारे साथ न्याय होगा……।
प्रस्तुति एन के जैन सीए, पत्रकार

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