सत्ता की चाबी हथियाने की कुचेष्टाओं का चुनाव

दिल्ली में विधानसभा के चुनाव जैसे-जैसे निकट आता जा रहा है, अपने राजनीति भाग्य की संभावनाओं की तलाश में आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस तीनों ही दल जनता को लुभाने एवं ठगने की हरसंभव कोशिश करते हुए दिखाई दे रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाकर भारतीय राजनीति में अपना सितारा आजमाने … Read more

व्यक्तित्व को उन्नत बनाने के आधारसूत्र

हर व्यक्ति में अपनी कोई-न-कोई विशेषता होती है। इन्हीं विशेषताओं से व्यक्तित्व बनता है और किसी भी व्यक्ति का वास्तविक परिचय उसका व्यक्तित्व ही है। श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही मानव जीवन की असली पूंजी होती है। इसके अभाव में व्यक्ति व्यावहारिक धरातल पर अत्यंत दरिद्र होता है। सभी का बाह्य जीवन व्यावहारिक पृष्ठभूमि में पलता-बढ़ता और … Read more

*विचार – प्रवाह*

भारतीय संस्कृति में परस्पर अभिवादन शिष्टाचार का अंग है । अभिवादन के कई तरीके हैं ।दोनों हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर , मुस्कराते हुए “नमस्ते” कहने का भारतीय पारंपरिक तरीका संसार भर में अनूठा है । नमस्ते का प्रयोग किसी से मिलने अथवा विदा लेते समय सम्मान प्रदर्शित करने और अभिवादन करने के अर्थ में किया … Read more

*तारीखें*

रोज़ आती है रोज़ जाती है तारीखें कितने रंग दिखाती है ! जन्म – मरण व्रत – त्योहार घटना – दुर्घटना दिन – वार सबकी याद दिलाती है तारीखें कितने रंग दिखाती है । मिलन – बिछोह हँसना – रोना उठना – गिरना पाना – खोना नित नए पाठ पढ़ाती है तारीखें कितने रंग दिखाती … Read more

असंतुलित आर्थिक संरचना पर मंथन जरूरी

दावोस में चल रहे वल्र्ड इकनॉमिक फोरम में ऑक्सफैम ने अपनी रिपोर्ट ‘टाइम टू केयर’ में समृद्धि के नाम पर पनप रहे नये नजरिया, विसंगतिपूर्ण आर्थिक संरचना एवं अमीरी गरीबी के बीच बढ़ते फासले की तथ्यपरक प्रभावी प्रस्तुति देते हुए इसे घातक बताया है। आज दुनिया की समृद्धि कुछ लोगों तक केन्द्रित हो गयी है, … Read more

टैक्स डाॅक्टर रामनिवास लखोटिया : आदर्श जीवन की विलक्षण दास्तान

जन्म लेना नियति है किंतु कैसा जीवन जीना यह हमारे पुरुषार्थ के अधीन है। खदान से निकले पाषाण के समान जीवन को पुरुषार्थ के द्वारा तरास कर प्रतिमा का रूप दिया जा सकता है। राजस्थान के गौरव एवं दिल्ली की सांसों में बसे श्री रामनिवास लखोटिया भी ही एक ऐसे ही जीवन की दास्तान है … Read more

*निर्भया*

निर्भया ! तुम हँसती- हँसती जलती हो उफ़ तक नहीं करती हो इतनी सहनशीलता कहाँ से पाई ? बालिग़ – नाबालिग़ बेख़ौफ़ होकर तुम्हें सताते हैं तुम्हारी मृत देह को कूड़े – करकट में फेंक आते है । निर्भया बोली क्या बताऊँ जीवनभर इसी तरह जली हूँ नाम की निर्भया हूँ मैं तो बस कठपुतली … Read more

*विचार – प्रवाह*

“पगड़ी” सिर पर बांधा जाने वाला परिधान या पहनावा है । इसकी शुरुआत मौसम की मार से सिर को बचाने के रूप में हुई होगी , धीरे – धीरे सामाजिक परम्परा के साथ – साथ यह आन – बान और सम्मान की प्रतीक बन गई । शिकागो ( अमेरिका ) में आयोजित धर्म – सम्मेलन … Read more

संकट की घड़ी

माला हाथ की हो या गले की दोनों की ही गरिमा महती है ज्ञानी – ध्यानी के हाथ और गले में ही शोभा देती है । अब ये लोग है ही कहाँ ? बगुला भगत ही पसरे हैं यहाँ – वहाँ । मालाएँ इन्हीं के कब्ज़े में पड़ी है आज हर भले आदमी और वस्तु … Read more

*कबाड़*

कबाड़ घर में हो या मस्तिष्क में निकाल देना ही ठीक है बड़े – बुजुर्गों की यही सीख है । कबाड़ रोक देता है हमारी गति- प्रगति भ्रमित कर देता है मानव – मति मानसिक तनाव बढ़ाता है दरिद्रता लाता है । अनुभव की कसौटी पर कसी हुई सीख है कबाड़ नकारात्मकता का प्रतीक है … Read more

*विचार – प्रवाह*

किसी विचारक ने लिखा है “विश्व के विस्तृत युध्द क्षेत्र में तुम एक बेजुबान गूँगे पशु की भाँति न हो जिसे जहाँ चाहे हाँका जा सके वरन इस युध्द में तुम एक वीर की भाँति लड़ो । बिना कठिनाइयों से लड़े , बिना उन्हें जीते , छुटकारा कहाँ ? ये कठिनाईयाँ , ये ठोकरें हमारी … Read more

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