भारत की पौराणिक स्मृति में कुछ कथाएँ ऐसी हैं, जो मुख्य आख्यानों के पीछे रह जाती हैं। रामायण का नाम आते ही हमारे सामने राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान और रावण के विराट चरित्र उभरते हैं। विभीषण, कुंभकर्ण और शूर्पणखा भी हमारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। लेकिन उसी विशाल कथा-परंपरा में एक स्त्री ऐसी भी है, जिसकी कहानी लंका के राजमहल से आरंभ होकर यमुना के किनारे बसे मधुवन तक पहुँचती है और अंततः मथुरा की प्राचीन स्मृति से जुड़ जाती है। उसका नाम है “कुंभिनासी”। कहीं उन्हें कुंभिनी कहा गया है, कहीं कुम्भीनसी। लोकप्रिय कथाओं में उन्हें रावण की बहन के रूप में याद किया जाता है। लेकिन जब रामायण की अलग-अलग परंपराओं और वंश-विवरणों को साथ रखकर देखा जाता है, तो उनका संबंध कुछ अधिक जटिल दिखाई देता है। यही जटिलता इस कथा को और रोचक बनाती है।कुंभिनासी की कहानी केवल एक राक्षसी स्त्री की कथा नहीं है। यह परिवार, सत्ता, प्रेम, प्रतिशोध, विवेक और नियति की ऐसी कहानी है, जिसके एक छोर पर लंका है और दूसरे छोर पर मथुरा। और इन दोनों के बीच खड़ी है – एक स्त्री। लंका के राजवंश से जुड़ी एक स्त्री रामायण की वंश-परंपरा में कुंभिनासी का संबंध लंका के राक्षस-कुल से अत्यंत निकट बताया गया है। विभीषण जब रावण को उनके अपहरण का समाचार देते हैं, तो उनके संबंध को मातृकुल के माध्यम से समझाते हैं। वे उन्हें भाइयों की बहन के समान बताते हैं। इसी कारण बाद की लोकप्रिय परंपरा में कुंभिनासी को रावण की बहन के रूप में जाना गया। लेकिन रामायण की कथा में एक दूसरा वंश-विवरण भी मिलता है, जिसमें कुंभिनासी को विश्वावसु और अनला की पुत्री तथा मधु की पत्नी कहा गया है। उन्हीं से लवण नामक पुत्र का जन्म बताया गया है। इसलिए कुंभिनासी को लेकर सबसे सावधानीपूर्ण बात यही होगी कि उन्हें रावण के मातृकुल से अत्यंत निकटता रखने वाली स्त्री कहा जाए, जिसे कथा में बहन के समान संबोधित किया गया है। भारतीय प्राचीन आख्यानों में रिश्तों की भाषा हमेशा आधुनिक जैविक संबंधों जैसी सीधी रेखा में नहीं चलती। मातृकुल, पितृकुल और कुल-संबंधों की अपनी सामाजिक संरचना थी। संभवतः इसी कारण कुंभिनासी की पहचान अलग-अलग पाठ-परंपराओं में कुछ भिन्न रूपों में दिखाई देती है। लेकिन उनके जीवन की अगली घटना बिल्कुल स्पष्ट है; और यहीं से कहानी में एक नया मोड़ आता है। मधु का आगमन उस समय लंका में शक्ति का केंद्र रावण था। उसकी महत्वाकांक्षा सीमाओं से परे फैल चुकी थी। वह विजय-अभियान पर था और उसके पीछे लंका की सत्ता, सेना और राजकीय प्रतिष्ठा का भार था। इसी समय एक शक्तिशाली राक्षस लंका पहुँचा। उसका नाम था “मधु”। मधु केवल बलवान ही नहीं था। रामायण की परंपरा में उसका चित्रण लवणासुर से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। वह ब्राह्मणों का सम्मान करता था, शरणागत की रक्षा करता था और देवताओं के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध रखने वाला बताया गया है। उसके व्यक्तित्व में शक्ति थी, लेकिन वह शक्ति अभी तक अनियंत्रित हिंसा में नहीं बदली थी। लेकिन कुंभिनासी को देखकर मधु का मन बदल गया। उसने कुंभिनासी को बलपूर्वक अपने साथ ले लिया। यह घटना उस समय हुई जब लंका के राजपरिवार के प्रमुख सदस्य अलग-अलग कार्यों में व्यस्त थे। रावण विजय-अभियान पर था, विभीषण अपने धार्मिक कर्म में लगे थे और कुंभकर्ण निद्रा में था। मधु ने अवसर का लाभ उठाया और कुंभिनासी को अपने साथ मधुपुरी ले गया। कुंभिनासी का यह हरण केवल एक स्त्री के जीवन में आए संकट की घटना नहीं थी। यह आने वाले एक बड़े संघर्ष का बीज था। क्योंकि कुंभिनासी जिस परिवार से आती थीं, वहाँ अपमान का उत्तर प्रायः तलवार से दिया जाता था। और रावण को जब यह समाचार मिला, तो उसका क्रोध स्वाभाविक ही था। रावण के लिए यह केवल किसी स्त्री का अपहरण नहीं था। यह उसके कुल को दी गई चुनौती थी। उसने अपनी सेना संगठित की और मधु की नगरी की ओर बढ़ चला। मधुपुरी पहुँचकर रावण ने मधु को खोजा, लेकिन वह वहाँ उपस्थित नहीं था। वहाँ उसे अपनी ही संबंधिनी कुंभिनासी दिखाई दी। रावण का क्रोध अभी शांत नहीं हुआ था। लेकिन कुंभिनासी ने उसे देखते ही भय से उसके चरण पकड़ लिए। उनके सामने दो पुरुष थे—एक उनका भाई और दूसरा उनका पति। और दोनों के बीच शीघ्र ही रक्तपात होने वाला था। कुंभिनासी ने रावण से अपने पति के प्राणों की रक्षा की प्रार्थना की। उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने केवल इतना कहा कि यदि मधु मारा गया तो उनका जीवन विधवा के रूप में समाप्त हो जाएगा। उन्होंने अपने पति के अपराध के बावजूद उसके प्राणों की याचना की। रावण का हृदय पिघल गया। उसने अपनी संबंधिनी की प्रार्थना स्वीकार कर ली। मधु को क्षमा कर दिया गया। लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं हुई। रावण ने मधु को अपना शत्रु बनाने के बजाय अपना सहयोगी बना लिया। वह चाहता था कि मधु उसके साथ देवताओं के विरुद्ध होने वाले अभियान में सहयोग करे। कुंभिनासी ने मधु को जगाया और उसे रावण के प्रस्ताव से अवगत कराया। मधु ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस प्रकार जिस घटना की शुरुआत अपहरण और प्रतिशोध से हुई थी, उसका अंत संबंध और राजनीतिक मैत्री में हुआ। यह कुंभिनासी के चरित्र का सबसे महत्वपूर्ण क्षण था। उन्होंने युद्ध नहीं लड़ा। उन्होंने कोई अस्त्र नहीं उठाया। लेकिन उन्होंने दो शक्तिशाली पुरुषों के बीच होने वाला युद्ध रोक दिया। उनका हथियार था – संबंध और संवाद। शिव का वरदान मधु की शक्ति केवल उसकी सेना या उसके व्यक्तिगत पराक्रम में नहीं थी। उसके पास भगवान शिव का दिया हुआ एक अद्भुत अस्त्र भी था। रामायण की कथा के अनुसार मधु ने घोर तपस्या से रुद्र को प्रसन्न किया था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उसे एक दिव्य शूल प्रदान किया। उस अस्त्र की शक्ति असाधारण थी। जब तक वह अस्त्र मधु के हाथ में रहता, उसे युद्ध में पराजित करना अत्यंत कठिन था। वह उस व्यक्ति का विनाश कर देता जो मधु को युद्ध के लिए चुनौती देता और फिर वापस अपने स्वामी के पास लौट आता। मधु ने शिव से प्रार्थना की कि यह शक्ति उसके वंश में बनी रहे। तब उसे बताया गया कि यह वरदान उसके पुत्र तक पहुँचेगा। जब तक वह दिव्य शूल उसके पुत्र के हाथ में रहेगा, वह संसार के प्राणियों के लिए लगभग अवध्य रहेगा। मधु ने उस वरदान को स्वीकार किया। लेकिन उसे शायद यह पता नहीं था कि भविष्य में यही वरदान उसके पुत्र के लिए शक्ति से अधिक अहंकार का कारण बनने वाला है। कुंभिनासी और लवणासुर मधु और कुंभिनासी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। … Read more