अजमेर

जैविक मच्छर नियंत्रण अभियान
लार्वाभक्षी मछलियों का किया गया वितरण अजमेर, 30 जुलाई। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. ज्योत्स्ना रंगा के निर्देशानुसार मच्छर जनित

जिला कलक्टर की अध्यक्षता में जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक आयोजित
राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों और विभागीय प्राथमिकताओं की हुई विस्तृत समीक्षा मौसमी बीमारियों के लिए करें घर-घर सर्वे एंटीलार्वा गतिविधियों तथा

जिला जन अभियोग एवं सतर्कता समिति की बैठक आयोजित
अजमेर, 30 जुलाई। जिला जन अभियोग एवं सतर्कता समिति की बैठक गुरूवार को कलेक्ट्रेट सभागार में जिला कलक्टर श्री लोक बंधु
चौपाल
कांवड़ यात्रा सुगम बनाई जाए
कांवड़ यात्रा से पहले बदहाल अजमेरदृपुष्कर मार्ग, क्या प्रशासन किसी हादसे का इंतजार कर रहा है? सावन माह में भगवान
लोकप्रियता के दम पर निर्दलीय विधायक बने थे ब्रह्मदेव कुमावत
राजस्थान सरकार के पूर्व संसदीय सचिव श्री ब्रह्मदेव कुमावत का गत दिवस देहावसान हो गया। ज्ञातव्य है कि उन्होंने अपनी
अजमेर के मीडिया फ्रेंडली राजनीतिज्ञ
आज हम चर्चा करेंगे अजमेर के उन राजनीतिक नेताओं की जो मीडिया फ्रेंडली रहे हैं और उनकी छवि के निर्माण
नजरिया
दवाइयां सिरहाने नहीं रखनी चाहिए
दवाइयां सिरहाने रखने से बीमारी से मुक्ति कठिन होती है, यह मान्यता भारत के कई हिस्सों में लोकविश्वास के रूप
हमारी शिक्षा पद्धति कितनी बेमानी है?
क्या आपने कभी ख्याल किया है कि हमारे यहां हायर एजुकेशन में जो विषय पढाए जाते हैं, उनका व्यावहारिक जीवन
प्रेंक वीडियो के नाम पर परोसी जा रही है अश्लीलता
इन दिनों यूट्यूब पर प्रेंक वीडियो खूब चलन में हैं। प्रेंक का मतलब होता है शरारत या मजाक। कई लड़के-लड़कियों
राजस्थान

साड़ी वियर काॅम्पीटिशन अगस्त में
भारतीय साड़ियां, अपनी समृद्ध संस्कृति, विविधता और उत्कृष्ट कारीगरी के लिए दुनिया भर मंे प्रसिद्ध हैं। हर राज्य की अपनी
त्रिसुगंधि साहित्य, कला एवं संस्कृति संस्थान करेगा 17 साहित्यकारों का सम्मान
9 अगस्त को उदयपुर में होगा भव्य सम्मान समारोह एवं पुस्तक विमोचन उदयपुर। त्रिसुगंधि साहित्य, कला एवं संस्कृति संस्थान, उदयपुर

आम आदमी पार्टी ने सदस्यता अभियान को गति देने की बनाई रणनीति
राजसमंद, 26 जुलाई। आम आदमी पार्टी, राजसमंद की जिला कार्यकारिणी की बैठक रविवार को जिला कलेक्ट्री परिसर के समीप आयोजित
अजमेर एट ए ग्लांस

अनेक सरकारी दफ्तरों की वजह से खास है अजमेर
सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह और तीर्थराज पुष्कर के साथ रेलवे का मंडल कार्यालय होने के कारण

अजमेर के वजूद में रेलवे का अहम किरदार
माना जाता है कि अजमेर का वजूद दरगाह, पुष्कर और कुछ राज्य स्तरीय दफ्तरों के साथ रेलवे की वजह से

पौराणिक व ऐतिहासिक तीर्थराज पुष्कर
अजमेर शहर से मात्र 11 किलोमीटर दूर तीर्थराज पुष्कर विश्वविख्यात है और पुराणों में वर्णित तीर्थों में इसका महत्वपूर्ण स्थान
कानाफूसी
वैभव गहलोत को अजमेर में लॉंच करने की तैयारी?
कानाफूसी है कि पूर्व मुख्यमंत्री अषोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत के लिए अजमेर में जमीन तलाषी जा रही है?

अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन द्वारा दिगम्बर जैन आदिनाथ जिनालय मैं विशेष पूजा विधान का आयोजन
श्री अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन शाखा अजमेर के तत्वाधान में मासिक पूजन की श्रंखला के तहत श्री दिगंबर जैन

नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के जन्मदिवस पर कांग्रेसजन ने किये सेवाकार्य
आज दिनांक 30 नवंबर – राजस्थान प्रतिपक्ष नेता एवं अलवर ग्रामीण विधायक टीकाराम जूली जी का 44 व जन्मदिन अजमेर
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गेस्ट-रायटर
विद्युतजिह्वा और शूर्पणखा: एक अनकही गाथा
रामायण काल का इतिहास केवल अयोध्या और लंका के बीच का नहीं था, बल्कि उसमें कई अन्य संस्कृतियाँ और वंश भी शामिल थे। लंकापति रावण जहाँ अपनी शक्ति से पूरे आर्यावर्त पर प्रभाव जमा रहा था, वहीं सुदूर दक्षिण के द्वीपों पर कालकेय दानव वंश का शासन था। इसी वंश का एक अत्यंत प्रभावशाली और मायावी राजकुमार था—विद्युतजिह्वा। विद्युतजिह्वा साधारण योद्धा नहीं था। जब वह युद्ध के मैदान में पूरी शक्ति से गर्जना करता था, तो उसके मुख से बिजली जैसी नीली आभा निकलती थी, जिसके कारण उसका नाम ‘विद्युतजिह्वा’ पड़ा। कालकेय वंश और रावण के राक्षस वंश में पीढ़ियों से संप्रभुता को लेकर मतभेद थे, क्योंकि कालकेय दानव समुद्र के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण रखते थे, जो लंका की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती था। दूसरी ओर, लंका की राजकुमारी शूर्पणखा (जिसका मूल नाम मीनाक्षी या चंद्रनखा भी मिलता है) लंका के कठोर राजसी नियमों और युद्ध के वातावरण से दूर एकांत प्रिय थी। उसके पास रूप बदलने की कला (कामरूपिणी विद्या) थी, जिसका उपयोग वह महल के बंधनों से मुक्त होकर प्रकृति के करीब जाने के लिए करती थी। एक बार शूर्पणखा लंका की सीमाओं को लांघती हुई सुदूर दक्षिण के एक एकांत और सुंदर द्वीप पर पहुँची। वहाँ उसने अपना राक्षसी रूप त्यागकर एक साधारण सुंदरी का रूप धारण किया और झरने के पास बैठकर वीणा बजाने लगी। उसी समय विद्युतजिह्वा भी अपनी टोली के साथ वहाँ से गुजर रहा था। वीणा की सम्मोहक ध्वनि सुनकर वह वहाँ पहुँचा। जब दोनों का सामना हुआ, तो राजनीतिक शत्रुता के बावजूद वे एक-दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए। शूर्पणखा को विद्युतजिह्वा का स्वतंत्र स्वभाव पसंद आया और विद्युतजिह्वा उसकी कला पर मुग्ध हो गया। दोनों ने अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर कई मुलाक़ातें कीं और अंततः दोनों के बीच प्रेम प्रगाढ़ हो गया। वे जानते थे कि राक्षस और दानव कुलों के बीच पुराना वैर होने के कारण समाज इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए, उन्होंने प्रकृति को साक्षी मानकर गांधर्व विवाह (गुप्त विवाह) कर लिया। इस विवाह से कालान्तर में उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम शंभू कुमार (कुछ ग्रंथों में जम्बुमाली या शंबूक) रखा गया। शूर्पणखा ने अपने पुत्र की सुरक्षा के लिए उसे दंडकारण्य के पंचवटी वनों में एक गुप्त स्थान पर रखा, जहाँ वह सूर्य देव की उपासना करने लगा। सत्य अधिक समय तक गुप्त नहीं रह सका। रावण के गुप्तचरों ‘शुक’ और ‘सारण’ ने लंका के राजदरबार में इस विवाह की सूचना दे दी। यह सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित हुआ, क्योंकि उसकी बहन ने लंका के शत्रु कुल के राजकुमार से संबंध बनाया था। रावण तुरंत विद्युतजिह्वा पर आक्रमण करने निकला, परंतु शूर्पणखा ने रावण के सामने आकर अपने सुहाग की रक्षा के लिए बहुत विलाप किया। अपनी बहन के प्रति स्नेह और लोक-लाज के कारण रावण ने अपना क्रोध शांत किया और विद्युतजिह्वा के सामने एक राजनैतिक शर्त रखी: उसे अपना स्वतंत्र राज्य छोड़कर लंका की अधीनता स्वीकार करनी होगी और रावण की सेना में सेवा देनी होगी। विद्युतजिह्वा ने अपनी पत्नी और पुत्र के भविष्य की रक्षा के लिए यह अपमानजनक समझौता स्वीकार कर लिया, परंतु उसके मन में अपनी स्वतंत्रता खोने का मलाल हमेशा रहा। कुछ समय पश्चात, रावण ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए ‘विश्व विजय अभियान’ प्रारंभ किया। इस अभियान में विद्युतजिह्वा को भी रावण की सेना की एक टुकड़ी का नेतृत्व करना पड़ा। जब रावण की सेना अन्य लोकों पर विजय प्राप्त कर अंतरिक्ष के मार्ग से वापस लंका लौट रही थी, तब कालकेय दानवों की एक अन्य टुकड़ी ने रावण की सेना पर अचानक धावा बोल दिया। युद्ध की उस अराजकता में, विद्युतजिह्वा के भीतर दबा हुआ रोष बाहर आ गया। उसने सोचा कि रावण के बढ़ते अहंकार और अपनी दासता को समाप्त करने का यही एकमात्र अवसर है। उसने युद्ध के मैदान में पीछे से रावण पर वार करने का प्रयास किया। परंतु रावण युद्ध कला में अत्यंत निपुण था। उसने तुरंत स्थिति को भांप लिया और विद्युतजिह्वा का वार विफल कर दिया। अपनी ही सेना के सेनापति द्वारा इस विश्वासघात को देखकर रावण का क्रोध चरम पर पहुँच गया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें रावण ने अपने दिव्य चंद्रहास खड्ग से विद्युतजिह्वा का वध कर दिया। जब रावण ने विद्युतजिह्वा के शव को शूर्पणखा के सामने प्रस्तुत किया, तो वह गहरे शोक में डूब गई। एक पत्नी के रूप में उसके भीतर रावण के प्रति तीव्र प्रतिशोध की भावना जागृत हुई। उसने रोते हुए रावण से कहा कि जिस अहंकार में आकर उसने अपनी बहन का घर उजाड़ा है, वही अहंकार एक दिन लंका के विनाश का कारण बनेगा और उसका यह साम्राज्य एक स्त्री के निमित्त ही नष्ट हो जाएगा। इसके बाद शूर्पणखा लंका का परित्याग कर पंचवटी के वनों में अपने पुत्र शंभू कुमार के पास रहने चली गई। नियति का चक्र यहाँ नहीं रुका। वनवास के दौरान भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण भी पंचवटी में निवास कर रहे थे। एक दिन, जब शंभू कुमार अपनी तपस्या के अंतिम चरण में था, आकाश से सूर्य देव द्वारा भेजी गई एक दिव्य तलवार झाड़ियों में आकर गिरी। वन में लकड़ियाँ एकत्रित करते समय लक्ष्मण जी की दृष्टि उस चमकीली तलवार पर पड़ी। उन्होंने उत्सुकतावश उसे उठाया और उसकी धार को परखने के लिए सामने की घनी झाड़ी पर वार कर दिया। दुर्भाग्यवश, उस झाड़ी के पीछे शंभू कुमार तपस्या में लीन था और लक्ष्मण के अनजाने में किए गए वार से उसकी मृत्यु हो गई। पति के बाद अपने इकलौते पुत्र को भी खो देने के बाद शूर्पणखा पूरी तरह टूट चुकी थी। वह जानती थी कि वह स्वयं न तो रावण से बदला ले सकती है और न ही राम-लक्ष्मण से। तब उसने अपनी राजनीतिक और मानसिक चतुरता का उपयोग करते हुए एक भयंकर योजना बनाई। वह सुंदर रूप धारण कर राम और लक्ष्मण के समीप गई, जहाँ विवाद बढ़ने पर लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान काट दिए। इसके बाद वह रक्त से लथपथ होकर रावण के पास पहुँची। उसने रावण को यह नहीं बताया कि उसका पुत्र मारा गया है या वह अपनी व्यक्तिगत बेइज्जती का बदला लेना चाहती है, बल्कि उसने रावण के राजा होने के अहंकार को उकसाने के लिए माता सीता के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन किया। रावण अपनी बहन की यह दशा देखकर और अपने अहंकार के वश में होकर माता सीता के हरण के लिए विवश हुआ, जो अंततः लंका के समूल नाश और रावण के अंत का कारण बना। इस प्रकार, इतिहास के पन्नों में छिपी विद्युतजिह्वा की यह कथा स्पष्ट करती है कि रामायण के महान युद्ध के पीछे कई अनसुने पारिवारिक और राजनैतिक कारण भी सक्रिय थे। राहत टीकमगढ़
मित्रता है मानवता का सबसे मजबूत सेतु
अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस, 30 जुलाई 2026 पर विशेषः आज का विश्व अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)
पूर्णिमा का अर्थ और महत्व
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह दिन महर्षि वेद व्यास के जन्म और गुरु के