आर्ट ऑफ मेडिसन

whatsapp-logo 450जी हां जनाब भूल जाइए कि कोई साइंस ऑफ मेडिसन भी होती है। हमारे देश में चिकित्सा विज्ञान की नहीं बल्कि चिकित्सा कला (आर्ट) की बात करनी चाहिए।
‘आर्ट ऑफ मेडिसन ‘ में दवाइयां रोग के हिसाब से वही बल्कि रोगी की जेब के हिसाब से लिखी जाती है।
हमारे डॉक्टर साब बड़े चमत्कारी होते हैं। ये साधारण जुकाम को ‘सीवियर रेस्पीरेटरी इंफेक्शन ‘ में तब्दील कर देे हैं परंतु भईयां केवल कागजों में ही करते हैं क्योंकि इनके भी कुछ ईमान-धरम होते हैं।

अपन मुद्दे से भटक रहे तो पुन: आर्ट ऑफ मेडिसन पर आते हैं।
हमारे देश में दवाईयां (मेडिसन) तीन श्रेणी की होती है।

1. जेनरिक मेडिसन- ये जेनरिक मेडिसन अनाथ बच्चे की तरह होती है। इसके मां व बाप नहीं होते और होते है, तो किसी को पता नहीं होते है। ये ‘साल्ट ‘ के नाम से ही जानी जाती है। इसमें किसी भी प्रकार की गुणवत्ता ब्रांड की प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगी होती है तो इसे ज्यादा मुनाफा कमाने के लिहाज से सब स्टैंडर्ड बनाया जाता है। इसका कोई धनी-धोरी नहीं होता है।
जैसे एक साल्ट है, ‘एमोक्सीलिन ‘ तो जेनरिक इसी साल्ट के नाम से ढेरों कम्पनीज बनाती है।
इसमें क्वालिटी और इसके असर करने की कोई गारंटी नहीं होती।

ये जेनरिक मेडिसन ‘दुकानदारो ‘ के अथाह मुनाफा देती है।
यानि ये मेडिसन बीमार को कम और दुकानदार को अधिक लाभ पहुंचाती है।

2. ब्रांडेड मेडिसन- इसमें कंपनी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होती है।

आज हम लोग पानी, पिज्जा, कपड़े, जूते व चश्में सभी कुछ ‘ब्रांडेड ‘ पहनते व खाते हैं तो ऐसे में ‘मेडिसन ‘ भी ‘ब्राडेंड ‘ लेना लोग पसंद करते हैं तथा नामी-गिरामी डॉक्टर्स भी इसे लिखना पसंद करते हैं।

इसका प्रचलन भी अधिक है।

ये असर कारक होती है।
तो जनाब बड़े डॉक्टर्स इन्हें लिखते हैं और अपने स्वयं के फायदे के दो या तीन पी.जी. यानि प्रोपोगन्डा मेडिसन भी लिख देते हैं।
वैसे आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) को तलवार इन डॉक्टर्स पर लटकी रहती है।

इसे इस तरह से समझा जाए। बड़ी और ब्रांडेड कम्पनीज को आईएमए में डॉक्टर्स को दी जाने वाली रकम व गिफ्ट का ब्यौरा देने को पाबंद कर दिया है वरना पहले तो बड़े मजे थे।

3. प्रोपोगेन्डा मेडिसन- ये बड़ा ही मजेदार आइटम है। इसे मेडिकल टरमोलॉजी में पीजी या प्रोपोगेंडा मेडिसन कहा जाता है।

ये मेडिसन मरीज को कोई फायदा नहीं पहुंचाती बल्कि उसी जेब हल्की और बीमारी भी बढ़ जाती है ।
जबकि इसके विपरीत पीजी मेडिसन डॉक्टर्स और बनाने वाली कंपनीज को निहाल कर देती है।
और आजकल बड़े डॉक्टर्स भी पीजी के लालच से अछूते नहीं है।

वे भी चार-पांच ब्रांडेड के साथ दो-तीन पीजी मेडिसन हल्के से सरका देते हैं।

तो जनाब देख लीजिए कैसे-कैसे डॉक्टर्स है और कैसी-कैसी दवाएं हैं।
मामला स्वास्थ्य का है और जुड़ा हुआ है अर्थतंत्र से। दुर्भाग्य यह है कि इन्होंने छोटे बच्चों को भी नहीं बख्शा।

– राजीव शर्मा, शास्त्री नगर
9414002571

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