लोकतंत्र और फ़ौज ?

sohanpal singh
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आदरणीय जनरल रावत का ब्यान जहां एक ओर अपने सैनिको को उत्साह वर्धक टॉनिक की तरह है तो दूसरी और अपने ही देश के गुमराह नागरिकों को दुश्मनी की पुरजोर और बेजोड़ धमकी है ? सवाल ये है की क्या सेना का राजनितिक गठजोड़ अपने संविधान के अनुरूप है ? हालांकि ऐसा नहीं है की नागरिक प्रशासन ने पहले कभी सेना का उपयोग नहीं किया हो परंतु वह स्थिति भयावह थी जब भारत गणराज्य का पंजाब प्रदेश आतंकवाद में आकंठ डूबा हुआ था और सिक्ख राज्य की स्थापना की घोषणा करने की तैयारी में पाकिस्तान से सहायता के इंतजार में था तब 1 से 6 जून 1984 के बीच सिक्खों के पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर में सेना की कार्यवाही करनी पड़ी थी लेकिन उसका अंत बहुत ही भयावह था तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी जान गवानी पड़ी थी जब खालिस्तान समर्थक सिक्ख सुरक्षा कर्मियों ने 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी ? और परिणाम स्वरुप उसका बदला तमाम निर्दोष सिक्खो को भुगतना पड़ा था जब दिल्ली सहित पुरे देश में सिक्खों का कत्ले आम किया गया । निर्दोष लोगो के कत्लेआम के दोषी आजतक सजा नहीं पा सके हैं । इसलिए नागरिक प्रशासन में फ़ौज का गठजोड़ बहुत ही खतरनाक ही है जिसका लोकतंत्र में कोई स्थान ही नहीं है ? इसलिए जनरल रावत का प्रदेश के कुछ दिग्भर्मित लोगो के प्रति जंग का ऐलान कुछ भी तर्क संगत नहीं है ? केवल राजनितिक रणकौशल में फेल नेताओं की आत्म संतुष्टि का उपाय मात्र ही है जिसका लोकतंत्र में कोई स्थान है ही नहीं ?

एस. पी. सिंह , मेरठ ।

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