जयपुर, जुलाई 2026: फाइज़र ने ‘एसीई-केयर नेटवर्क’ पहल के तहत महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एमजीएमसीएच), जयपुर के साथ मिलकर एक वैज्ञानिक शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किया। इसका उद्देश्य अस्पताल-आधारित एंटीकोआगुलेशन स्टीवर्डशिप प्रोग्राम के विकास को समर्थन देना है। यह कार्यक्रम एट्रियल फिब्रिलेशन (एएफ) के बेहतर प्रबंधन पर केंद्रित है। एएफ एक सामान्य हृदय-लय विकार है, जिसमें स्ट्रोक का जोखिम काफी बढ़ जाता है। इस पहल के जरिए साक्ष्य-आधारित उपचार, एकरूप प्रोटोकॉल और विभिन्न विशेषज्ञताओं के बीच बेहतर समन्वय को बढ़ावा दिया जा रहा है।
फाइज़र में मेडिकल अफेयर्स के प्रमुख, डॉ. पंकज गुप्ता ने कहा, “एट्रियल फिब्रिलेशन के मरीजों के बेहतर परिणाम के लिए विभिन्न विशेषज्ञताओं के बीच मजबूत समन्वय जरूरी है। ‘एसीई-केयर नेटवर्क’ के तहत इस साझेदारी के माध्यम से हम चिकित्सकों को नवीनतम वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं और उपचार में एकरूपता को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे स्ट्रोक का जोखिम कम किया जा सके।”
एमजीयूएमएसटी के प्रो-वाइस चांसलर और सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के प्रोफेसर, डॉ. वी.के. कपूर ने कहा, “एमजीएमसीएच ‘एसीई-केयर नेटवर्क’ पहल के माध्यम से फाइज़र के साथ साझेदारी कर एंटीकोआगुलेशन स्टीवर्डशिप को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रभावी प्रबंधन के लिए विभिन्न विशेषज्ञताओं के बीच समन्वित दृष्टिकोण जरूरी है, ताकि जोखिम कम करते हुए मरीजों को सही समय पर उपयुक्त उपचार मिल सके। ऐसी पहलें जागरूकता बढ़ाने, सर्वोत्तम प्रथाओं को मानकीकृत करने और मरीजों की सुरक्षा व उपचार परिणामों में सुधार में मदद करती हैं।”
इस कार्यक्रम में 100 से अधिक स्वास्थ्य पेशेवरों ने भाग लिया। इसमें विशेषज्ञों के नेतृत्व में वैज्ञानिक सत्र, केस चर्चा और तृतीयक देखभाल में एंटीकोआगुलेशन से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर बहु-विषयक विचार-विमर्श शामिल रहा। चर्चाओं में एएफ में स्ट्रोक की रोकथाम, पोस्ट-एसीएस/पीसीआई एंटीकोआगुलेशन से जुड़े निर्णय, स्ट्रोक मरीजों में छूटे हुए एएफ की पहचान, तीव्र वेनस थ्रोम्बोएम्बोलिज्म, उच्च जोखिम वाले मरीजों की प्रोफाइल, तथा एंटीकोआगुलेशन थेरेपी की शुरुआत, अस्थायी रोक, पुनः शुरुआत और निगरानी से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि एंटीकोआगुलेशन से जुड़े फैसले किसी एक चिकित्सक तक सीमित न रहकर अस्पताल-स्तर की स्टीवर्डशिप व्यवस्था के तहत लिए जाएं। यह व्यवस्था साझा मानकों, स्पष्ट जवाबदेही, व्यवस्थित संचार और मरीज-केंद्रित फॉलो-अप पर आधारित होनी चाहिए। तृतीयक देखभाल अस्पतालों में, जहां मरीज इमरजेंसी, कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, सर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स, आईसीयू, मेडिसिन और डिस्चार्ज जैसी विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं, हर स्थानांतरण उपचार की निरंतरता और मरीज की सुरक्षा बेहतर करने का अवसर होता है।
भारत में एट्रियल फिब्रिलेशन के लगभग 79 लाख मामले अनुमानित हैं और यह संख्या दुनिया में दूसरी सबसे अधिक है। एएफ से पीड़ित लोगों में सामान्य हृदय-लय वाले लोगों की तुलना में स्ट्रोक का जोखिम तीन से पांच गुना अधिक होता है। ऐसे में समय पर पहचान, जोखिम-आधारित उपचार और नियमित पुनर्मूल्यांकन बेहद महत्वपूर्ण है।
यह पहल अस्पताल के विभिन्न विभागों के बीच एंटीकोआगुलेशन प्रबंधन को लेकर एक समान समझ विकसित करने पर केंद्रित है। ‘एसीई-केयर’ का उद्देश्य सुरक्षित निर्णय-प्रक्रिया को बढ़ावा देना, उपचार में अनावश्यक भिन्नताओं को कम करना और निदान से लेकर डिस्चार्ज व फॉलो-अप तक देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित करना है। यह कार्यक्रम दिशानिर्देशों को व्यावहारिक, अस्पताल-उपयोगी प्रक्रियाओं में बदलने में मदद करता है। इसके प्रमुख तत्व हैं: जोखिम का आकलन और उपयुक्त उपचार निर्णय, मानकीकृत एंटीकोआगुलेशन उपचार मार्ग, बहु-विशेषज्ञता समन्वय, देखभाल के विभिन्न चरणों में सुरक्षा सुनिश्चित करना, मरीज-केंद्रित परामर्श और दवा अनुपालन में सहयोग, मूल्यांकन और निरंतर सुधार।
इस सहयोग से एमजीएमसीएच में एट्रियल फिब्रिलेशन और एंटीकोआगुलेशन प्रबंधन को और सुदृढ़ करने की उम्मीद है। समय पर पहचान, प्रोटोकॉल-आधारित उपचार, समन्वित रेफरल व फॉलो-अप और साक्ष्य-आधारित थेरेपी के निरंतर उपयोग से जयपुर और आसपास के क्षेत्रों के मरीजों में स्ट्रोक का जोखिम कम करने, सुरक्षा बढ़ाने और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणाम बेहतर करने में मदद मिल सकती है।