बिंदास व्यक्तित्व। लंबी कद काठी। रोबदार चेहरा। तनी हुई मूछें। और लाल बुलट की सवारी। भाजपा और सिंधी समुदाय के हर कार्यक्रम में दिखाई देने वाले इस व्यक्तित्व को आप भलीभांति जानते हैं। आप हैं वरिष्ठ भाजपा नेता व आरएएसएस के पुराने स्वयंसेवक श्री तुलसी रोचीराम सोनी दूलानी। आगामी 24 अक्टूबर को अस्सी वर्ष के हो रहे हैं। उनका पूरा जीवन संघ की विचारधारा के लिए जूझते हुए बीता है। बचपन में आठ साल की उम्र में चंद्रकुंड शाखा से जुडे रहे और गणनायक से नगर कार्यवाह तक के पद पर रहे। आपात काल के दौरान 1975 में दस माह के लिए जेल में रहे।
एक बार संघ प्रचारक धर्मनारायण जी ने प्रस्ताव रखा कि अजमेर पश्चिम क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लडें, लेकिन संघ के काम को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने चुनाव लडने से मना कर दिया। तब स्वर्गीय श्री नवल राय बच्चानी को उम्मीदवार बनाया गया और वे विधायक बने। बाद में संघ के आदेश पर राजनीति में प्रवेश किया। पहले मंडल अध्यक्ष, फिर जिला उपाध्यक्ष और महामंत्री के पद पर रहे।
एक बार फिर अजमेर पश्चिम से भाजपा टिकट के प्रबल दावेदार रहे, मगर पार्टी ने वासुदेव देवनानी को मौका दिया। जाहिर तौर पर मन को बहुत कष्ट हुआ होगा, मगर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। एक बार पार्षद का चुनाव लडा, मगर पार्टी की अंदरूनी राजनीति के कारण पराजित हो गए।
उनके परिवार ने विभाजन की विभीषिका को भी झेला। उनके पिता रुची राम जी सिंध के शिकारपुर में सोने चांदी के जेवरात बनाने का काम करते थे। वे शिकारपुर की शाखा के मुख्य शिक्षक की भूमिका में थे, इसलिए परिवार को कुछ ज्यादा ही खतरा था। कट्टरपंथियों के हमले से बचने के लिए तब पिता ने बम बनाने का फैसला किया। विस्फोटक सामग्री से जब बम बनाया जा रहा था, तभी बम फट गया। इससे पिता के हाथ की दो अंगुलिया नष्ट हो गई। विभाजन के वक्त वे समुद्र मार्ग से मुंबई पहुंचे। वहां जेवरात बनाने का काम आरंभ किया। लेकिन बाद में दुकान अपने छोटे भाई को सौंप दी और 1951 में अजमेर आ गए। फिर अजमेर में सोने चांदी के जेवरात बनाने का काम नया बाजार में शुरू किया।
श्री तुलसी सोनी का जन्म 24 अक्टूबर 1946 को हुआ। आपने मुंबई से बीकॉम की शिक्षा अर्जित की। आपने 1965 से स्वर्णकार का काम आरंभ किया। समाजसेवा उनमें कूट कूट कर भरी है। हर वक्त जरूरतमंद की सेवा को तत्पर रहते हैं। 25 जून 1975 की रात को जब देश में आपातकाल की घोषणा हुई तो उस रात वे संघ के अन्य स्वयंसेवकों की तरह गिरफ्तार होना चाहते थे, मगर प्रचारक धर्मनारायण जी के आदेश पर भूमिगत हो, ताकि जेल गए स्वयंसेवकों के परिवार वालों को संभालें। आपातकाल में दस माह तक जेल से बाहर रहकर सक्रिय भूमिका निभाई। आखिरकार 10 अप्रैल 1976 को करीब पचास जवानों के साथ घेर लिया। बचने का कोई रास्ता नहीं था, अतः सरेंडर कर दिया। जेल में बंदियों के साथ अन्याय हो रहा था। इसके विरोध में 10 दिनं तक अनशन पर रहे। 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटा और वे रिहा हो गए।
वे अस्सी वर्श की उम्र में भी पूरी तरह से फिट हैं। दिलचस्प है कि उम्र के इस पडाव पर भी समाज की युवा टीम के खेवनहार हैं। सेल्फी लेने और वीडियो बनाने की बहुत षौक है। अजमेरनामा न्यूज पोर्टल उनकी दीर्घायु व स्वस्थ जीवन की कामना करता है।