अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस (25 अक्टूबर) पर विशेष
कला एवं कलाकार मानव सभ्यता की आत्मा है। यह वह अनंत भाषा है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने अंतरतम की संवेदनाओं, अनुभूतियों, विचारों और स्वप्नों को रूप, रंग, ध्वनि, शब्द, लय और भावों में अभिव्यक्त करता है। जब आदिम मानव-कलाकारों ने गुफाओं की दीवारों पर अपनी अनुभूतियों को चित्रित किया होगा, जब किसी कलाकार ने पत्थर को तराशकर उसमें आकृति का सौंदर्य खोजा होगा अथवा किसी ने प्रकृति की ध्वनियों से प्रेरित होकर पहली बार सुरों को साधा होगा, तभी से कला ने मानव जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई होगी। कला की यात्रा वस्तुतः मानव चेतना के विकास, उसकी कल्पनाशीलता और उसकी संवेदनशीलता की यात्रा है। प्रत्येक वर्ष 25 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस इसी सृजनशील चेतना को सम्मान देने तथा समाज और सभ्यता के निर्माण में कलाकारों के योगदान को पहचानने का अवसर है। लेकिन इस दिवस की सार्थकता केवल कलाकारों का अभिनंदन करने, चित्रकला प्रदर्शनियों का आयोजन करने, संगीत समारोहों में भाग लेने अथवा कलाकृतियों की प्रशंसा करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। आज जब विश्व युद्धों की आशंकाओं, आतंकवाद, हिंसा, धार्मिक एवं वैचारिक टकराव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और महाशक्तियों के वर्चस्ववादी संघर्षों से घिरा हुआ है, तब कला और कलाकार की भूमिका पहले से कहीं अधिक व्यापक और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य की तकनीकी प्रगति, आर्थिक समृद्धि और सैन्य शक्ति उसे अधिक शांतिप्रिय बना सकी है? यदि नहीं, तो निश्चित रूप से हमें उस मानवीय चेतना की ओर लौटना होगा, जो मनुष्य को केवल शक्तिशाली नहीं, बल्कि संवेदनशील, सहिष्णु और करुणाशील बनाती है। कला इसी चेतना का सबसे प्रभावशाली माध्यम है।
वर्तमान विश्व की विडंबना यह है कि एक ओर विज्ञान ने दूरियों को समाप्त कर दिया है, संचार के साधनों ने दुनिया को एक वैश्विक परिवार का स्वरूप दिया है और आर्थिक संबंधों ने राष्ट्रों को परस्पर निर्भर बनाया है; दूसरी ओर मनुष्यों के बीच अविश्वास, घृणा और संघर्ष की दीवारें भी ऊँची होती जा रही हैं। युद्धभूमियों में बिखरते परिवार, आतंकवाद की भेंट चढ़ते निर्दाेष जीवन, विस्थापन की पीड़ा झेलते बच्चे और वर्चस्व की राजनीति में कुचले जाते छोटे राष्ट्र इस प्रश्न को सामने रखते हैं कि विकास का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या विकास केवल ऊँची इमारतों, आधुनिक हथियारों, विशाल बाजारों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक सीमित है, अथवा उसका वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के जीवन को सुरक्षित, सुंदर, स्वतंत्र और आनंदमय बनाना भी है? कला और कलाकार इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य के हृदय में खोजते हैं। वे याद दिलाते हैं कि सभ्यता की महानता विनाश की क्षमता से नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और सह-अस्तित्व की योग्यता से मापी जानी चाहिए।
राजनीति और कूटनीति जहाँ कई बार हितों, सीमाओं और शक्ति-संतुलन के गणित में उलझ जाती हैं, वहीं कला और कलाकार मनुष्य के साझा दुख और साझा आनंद को सामने लाती है। एक चित्रकार युद्ध से उजड़े घर की तस्वीर बनाता है, तो उसमें किसी एक देश का नहीं, संपूर्ण मानवता का दर्द दिखाई देता है। एक संगीतकार जब करुणा से भरी धुन छेड़ता है, तो उसकी भाषा समझने के लिए किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती। किसी कवि की पंक्तियों में व्यक्त प्रेम, किसी नर्तकी की भाव-भंगिमा में झलकती पीड़ा और किसी मूर्तिकार की रचना में उभरती मानवीय गरिमा भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर हृदयों को जोड़ती है। यही कला की वह शक्ति है, जो शत्रुता के बीच संवाद, निराशा के बीच आशा और विभाजन के बीच आत्मीयता के पुल बना सकती है। कला और युद्ध के बीच का अंतर भी गहरे चिंतन का विषय है। युद्ध की मानसिकता दूसरे को पराजित करने में अपनी विजय खोजती है, जबकि कला दूसरे के अनुभव को समझने की दृष्टि प्रदान करती है। युद्ध सीमाओं पर दीवारें खड़ी करता है, कला उन दीवारों के पार झाँकना सिखाती है। हथियार शरीर को घायल करते हैं, किंतु घृणा मनुष्य की आत्मा को भी आहत करती है; कला उस आत्मा के घावों को भरने का प्रयास करती है। जहाँ हिंसा प्रतिशोध को जन्म देती है, वहीं सच्चा कलात्मक सृजन सहानुभूति और आत्ममंथन की प्रेरणा देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कला अकेले युद्ध रोक सकती है अथवा कलाकारों की अभिव्यक्ति मात्र से आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। युद्धों को रोकने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, न्यायपूर्ण नीतियाँ, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रभावी संस्थाएँ आवश्यक हैं। लेकिन इन प्रयासों को स्थायी आधार देने के लिए ऐसी मानवीय चेतना चाहिए, जो हिंसा को गौरव और शांति को कमजोरी न समझे। कला इसी चेतना के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कला का संबंध केवल मनोरंजन से नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, आध्यात्मिकता और सामाजिक समरसता से भी रहा है। यहाँ संगीत साधना है, नृत्य भावों की अभिव्यक्ति है, साहित्य लोकमंगल की चेतना है और लोककला समुदायों की स्मृति एवं पहचान का जीवंत दस्तावेज है। जैन दर्शन का अहिंसा और अनेकांत का संदेश भी हमें सिखाता है कि सत्य को समझने के लिए दृष्टियों की विविधता का सम्मान आवश्यक है। अनेकांत की भावना कला की प्रकृति से मेल खाती है, क्योंकि एक ही दृश्य, घटना अथवा अनुभूति को अलग-अलग कलाकार भिन्न दृष्टिकोणों से अभिव्यक्त कर सकते हैं। इन विविध अभिव्यक्तियों को स्थान देना संवाद, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व को मजबूत करता है। इसके बावजूद आज कलाकारों के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। बाजार का दबाव कई बार कला को केवल लाभ और लोकप्रियता की कसौटी पर परखता है। त्वरित प्रसिद्धि की चाह, अभिव्यक्ति पर अनुचित प्रतिबंध, सांस्कृतिक असहिष्णुता और रचनात्मक स्वतंत्रता के प्रति संदेह कलाकार की संभावनाओं को सीमित कर सकते हैं। डिजिटल माध्यमों ने सृजन के अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन सतही लोकप्रियता की प्रतिस्पर्धा ने गंभीर कलात्मक अभिव्यक्ति के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। कलाकार का सम्मान केवल पुरस्कार देकर या उसकी रचना की प्रशंसा करके पूरा नहीं होता; उसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति, गरिमापूर्ण आजीविका, उचित पारिश्रमिक और सुरक्षित रचनात्मक वातावरण उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। साथ ही कलाकारों का दायित्व है कि वे अपनी स्वतंत्रता का उपयोग समाज में घृणा फैलाने के बजाय विवेक, संवेदना और संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए करें।
अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस हमें इस दिशा में सामूहिक संकल्प लेने का अवसर देता है। विशेष रूप से नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि सृजनशीलता का सर्वाेच्च उपयोग केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज को अधिक न्यायपूर्ण, सुंदर और मानवीय बनाने में है। वास्तव में कला मनुष्य को यह विश्वास दिलाती है कि विनाश के अंधकार के बीच भी सृजन का दीप जलाया जा सकता है। वह हमें सिखाती है कि जीवन का सौंदर्य दूसरों को पराजित करने में नहीं, उनके साथ मिलकर जीने में है; मित्रता का अर्थ केवल समान विचारों वालों से निकटता नहीं, बल्कि भिन्नताओं के बावजूद सम्मान बनाए रखना है; और शांति का अर्थ केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, करुणा और परस्पर विश्वास की उपस्थिति भी है। कलाकार अपने रंगों, स्वरों, शब्दों, मुद्राओं और कल्पनाओं से ऐसे विश्व की तस्वीर रच सकते हैं, जिसमें मनुष्य की पहचान उसकी जाति, भाषा, धर्म या राष्ट्रीयता से पहले उसकी मानवीय गरिमा से हो।
अंतर्राष्ट्रीय कलाकार दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि जहाँ हथियार भय पैदा करते हैं, वहाँ कला विश्वास जगाती है; जहाँ घृणा मनुष्यों को बाँटती है, वहाँ सृजन उन्हें जोड़ता है; और जहाँ युद्ध जीवन को उजाड़ते हैं, वहाँ कला जीवन को फिर से सुंदर बनाने का स्वप्न देती है। आज विश्व को केवल शक्तिशाली सेनाओं, समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं और आधुनिक तकनीकों की ही आवश्यकता नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील कलाकार हृदयों की भी आवश्यकता है, जो शांति को जीवन का आदर्श बना सकें। कलाकार मानवता के ऐसे ही स्वप्नद्रष्टा और भविष्य के शिल्पी हैं। उनके सृजन को सम्मान देना वस्तुतः मनुष्यता के उज्ज्वल भविष्य का सम्मान करना है। जब कला जीवन का उत्सव बनेगी, संवेदना सामाजिक संस्कार बनेगी और सह-अस्तित्व वैश्विक जीवन-दृष्टि बनेगा, तभी पृथ्वी युद्धों की आशंकाओं से मुक्त होकर शांति, मैत्री, अहिंसा और सौंदर्य की साझा धरती बन सकेगी।
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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