अजमेर में रूहानी क्रांति

शिव शर्मा
सूफी संत गुरुदेव (हजरत हर प्रसाद मिश्रा उवेसी) ने अजमेर में एक रूहानी क्रांति आगे बढायी। उन्होंनं सूफि साधना पद्धति को ब्राह्मण, अग्रवाल व जैन समाज तक पहुंचाया। अधिकतर मुरीदों को उनके इस्मै आजम ( नाम के रूहानी संदर्भ ) के अनुसार सूफी मंत्र दिये। ये मुरीद आयते करीमा, दरुद शरीफ,अल्हम्दु और ‘ अल्लाह् हुस्मद’ का पाठ करते हैं। ऐसे ही गुरु ओम तत्सत, ओम नमः शिवाय, हरि ओम तत्सत, णमोकार मंत्र आदि का पाठ भी किया जाता है। यहां सूफी साधना, सहज योग, ध्यान योग, नाद योग एवं तंत्र साधना का समन्वय है।
एक मुरीद के अनुसार — ” मेरे पीर साहब ने मुझे वैष्णव मंत्र की साधना चर्च में , सूफी मंत्र का जाप मंदिर में और णमोकार मंत्र की साधना दरगाह में कराई ।आप की प्रेरणा से मैने सूफी फकीर के आस्ताने में नाद योग का अभ्यास किया। आप सूफी थे लेकिन गीता के श्लोकों के अर्थ आप ने ही समणए।मैने आयते करीमा, दरुद शरीफ, कलमा, णमोकार मंत्र एवं वैष्णव मंत्र के जाप साथ साथ भी किये – एक ही सिटिंग में क्रमशः। नवरात्रा की साधना के साथ चिल्ला भी किया- यह आध्यात्मिक क्रांति ही है।”
जहां हिंदू स्त्रियां करवा चैथ का व्रत एक सूफी फकीर का मुंह देख कर पूरा कर लें , वह रुहानी क्रांति ही है। जब विवाह के कार्ड पर गणेश जी के साथ बाबा बादाम शाह का नाम भी लिखा जाए तो उसे आंतरिक क्रांति ही कहेंगे। जब घर वाली पूजा की ताक में राम कृष्ण के साथ मुसलमान फकीरों को भी विराजमान किया जाए तो सिद्ध हो जाता है कि गुरुदेव एक क्रांति पुरुष थे। यह उन्हीं का प्रभाव है कि ब्राह्मण, अग्रवाल, जैन व राजपूत घरों में उनके देवी देवताओं के साथ अब सूफी फकीरों की भी पूजा हाने लगी है। यह क्रांति है। हम दरगाह में जा कर होली दीवाली की राम राम करते हैं, यह क्रांति है।शादी के बाद वर वधू को अपने देवी देवताओं के स्थान पर ले जाने के बाद यहां दरगाह में भी लाते हें, यह क्रांति है। हम अपनी समस्याओं के समाधान के लिए खानदानी देवी देवताओं के साथ फकीरों की मजार पर सिर झुकाने लगे हैं , यही क्रांति है।
एक बदलाव शुरू हो गया है – हम माता के चूंदङी चढाते हैं तो मजार पर चादर भी पेश करना सीख गए हैं। देवताओं के भोग भी लगाते हैं और फातिहा में भी यकीन करने लगे हैं। अपने देवी देवताओं के तिथि वार की तरह गुरुवार को याद रखने लगे हैं। लेकिन क्या ऐसी तब्दीली के साथ हमारा आंतरिक जुङाव है ? ावा कुलीय संस्कारों में ही परिवर्तन आ रहा है! रूहानी स्तर पर तो कोई भेद है ही नहीं किंतु सवाल तो दुनियावी स्तर पर है। इस स्तर पर भी गुरुदेव हजरत हर प्रसाद मिश्रा व्यसने क्रांति की है z

रूहानी पुरुष पुस्तक से उद्धृत

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