
प्रतिवर्ष भाद्र मास की शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष की नवमियों को गोगाजी की स्मृति में मेला लगता है। हिंदू इन्हें गोगा वीर तथा मुसलमान इन्हें गोगा पीर कहते हैंहनुमानगढ़ जिले के नोहर भादरा उपखंड में स्थित गोगाजी के पावन धाम गोगामेड़ी स्थित गोगाजी का समाधि स्थल जन्म स्थान से लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है, जो साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक है, जहाँ एक हिन्दू व एक मुस्लिम पुजारी खड़े रहते हैं। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगामेड़ी के मेले में वीर गोगाजी की समाधि तथा गोगा वीर व जाहिर वीर के जयकारों के साथ गोगाजी तथा गुरु गोरक्षनाथ के प्रति भक्ति की अविरल धारा बहती है।
भक्तजन गुरु गोरक्षनाथ के टीले पर जाकर शीश नवाते हैं, फिर गोगाजी की समाधि पर आकर ठोक देते हैं। जालोर जिले के सांचौर की छोरियों की ढाणी में भी ‘गोगाजी की ओल्डी’ नामक स्थान पर गोगाजी का मंदिर है।
विद्वानों व इतिहासकारों ने उनके जीवन को शौर्य, धर्म, पराक्रम व उच्च जीवन आदर्शों का प्रतीक माना है।
मेले में राजस्थान के अलावा जम्मू व कश्मीर,पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश व गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाज
गोगाजी युद्ध में चप्पल और सिद्ध होने के कारण रणक्षेत्र में हर कहीं दिखाई देते थे। उनके इस रणकौशल को देखकर ही महमूद गजनवी ने कहा था कि यह तो ‘जाहीरा पीर’ है अर्थात् साक्षात् देवता के समान प्रकट होता है। इसलिए ये ‘जाहर पीर’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।(कुछ लोग जाहर पीर का मतलब भगवान नरसिंह के वीर से जोड़ते है) राजस्थानी लोक कथा अनुसार ये युद्ध भूमि में अपने 47 पुत्रों तथा 60 भतीजों के साथ वीरगति हुए ।
राजस्थान का किसान वर्षा के बाद हल जोतने से पहले गोगाजी के नाम की राखी ‘गोगा राखड़ी’ हल और हाली, दोनों को बाँधता है। गोगाजी के ‘थान’ खेजड़ी वृक्ष के नीचे होते हैं, जहाँ मूर्ति एक पत्थर पर सर्प की आकृति अंकित होती है। इसलिए बागड़ में तो यह कहावत है कि ‘गाँव-गाँव गोगो ने गाँव-गाँव खेजड़ी। ऐसी मान्यता है कि युद्ध भूमि में लड़ते हुए गोगाजी का सिर चूरू जिले के जिस स्थान पर गिरा था वहाँ ‘शीश मेड़ी’ तथा युद्ध करते हुए जहाँ शरीर गिरा था उसे ‘गोगामेड़ी’ कहा गया। गोगाजी के जन्म स्थल ददरेवा को ‘शीर्ष मेड़ी’ तथा समाधि स्थल ‘गोगा मेडी’हिन्दू मुस्लिम सौहार्द के प्रतीक गोगा पीर गोगा जी का जन्म उसी चौहान वंश में हुआ था | वास्तव में चौहान वंश में पृथ्वीराज चौहान के बाद सबसे ज्यादा ख्याति प्राप्त राजा गोगा जी ही है। मान्यता मुताबिक गोगा जी का राज्य सतलुज से हांसी (हरियाणा) तक था।गोगा जी का जन्म राजस्थान के ददरेवा में चौहान वंश के शासक जैबर (जेवर सिंह) की पत्नी बाछल देवी के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद और उनके दुवारा दिए गये वरदान से हुआ था।लोक देवता गोगा जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इसे गोगा नवमी से जानें। राजस्थान के लोग गोगा जी की पूजा बड़ी धूमधाम से करते हैं।गोगा देव का जन्म स्थान पर सभी धर्म और संप्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं और श्रद्धा पूर्वक पूजा अर्चना करते हैं | गोगा जी की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़ों का अस्तबल है। सैकड़ों साल बाद भी उनके घोड़े की रकाब अभी भी कहीं पर हैं।गोगाजी ने 11 बार मुसलमान राजा और आक्रमणकारियों से युद्ध किया था. गोगाजी ने सोमनाथ युद्ध के बाद (गुजरात) मंदिर को लूट कर ले जा रहे, महमूद गजनवी को युद्ध में हरा कर धन लूट कर गरीबों में बाटा था. गोगाजी महाराज मुस्लिम आक्रांताओं से गायों की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे l लोककथा के अनुसार गोगा जी के दो मौसेरे भाई थे – अर्जुन और सुरजन। गोगा जी का अपने मौसेरे भाई अर्जन व सुरजन के साथ जमीन जायदाद को लेकर झगड़ा था। ऐसा माना जाता है कि अर्जन-सर्जन ने मुस्लिम आक्रांता महमूद गजनवी की मदद से गोगा जी पर आक्रमण कर दिया था। महमूद गजनवी के साथ युद्ध में गोगा जी वीरता के साथ सतलज मार्ग की रक्षा कर रहे थे। इसी युद्ध में गोगा जी अपने पुत्रों के साथ शहीद हो गए। माना जाता है कि युद्ध के समय गोगा जी को सर ददरेवा (चूरू) में गिरा दिया गया था।
लोगों का मानना है कि बिना सर गोगा जी से युद्ध करते देख महमूद गजनी ने गोगा जी को सच्चा पीर कहा था।
लोक कथाओं के अनुसार गोगा जी को सांप के देवता के रूप में पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर तौर पर वीर और जहर पीर के गांव से बुलाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार गोगा देवता की पूजा करने से सांपों से रक्षा होती है।
गोगा जी की पत्नी को सांप ने काट लिया। सांप के काटने से केलमदे की मृत्यु हो गई जिससे गोगा जी क्रोधित हो गए और अग्नि संस्कार कर दिया। इस अनुष्ठान में कई सांप जल कर भस्म हो गए। इसके बाद सांपो के मुखिया सामने आये और तीर्थयात्रा पर रोक लगाने का आग्रह किया। साँपो के मुखिया ने केलमदे को जीवित कर दिया। इस प्रकार गोगा जी ने साँपो पर विजय प्राप्त की। तब से गोगा जी सांपो या नागों के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
डा जे के गर्गपूर्व संयुक्त निदेशक कॉलेज शिक्षा जयपुर
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