
दीक्षा रूहानी कर्म है। यह गुरु की ऐसी कृपा है जो शिष्य को आत्मबोध कराती है। उसे परम सत्ता तक ले जाती है। दीक्षा का दुनियावी सुख-भोग से कोई संबंध नहीं है। रोटी, कपड़ा, मकान, बरकत आदि के लिए महात्मागण अलग-अलग मंत्र देते हैं। अपनी संकल्प शक्ति से भी सुख-भोग उपलब्ध करा देते हैं। किंतु दीक्षा मंत्र तो केवल रूहानी यात्रा के लिए होता है; मुरीद का आध्यात्मिक कल्याण करने के लिए होता है।
सद्गुरु जब किसी मनुष्य को अपनी आंतरिक चेतना से जोड़ देता है, तो उसे दीक्षा कहते हैं। सद्गुरु यानि जिसका भगवान से रूहानी संबंध है। जिसकी आत्मचेतना परम सत्ता से जुड़ी हुई है। उधर शिष्य यानि जिसमें गुरु के प्रति रूहानी समर्पण का भाव है। शिष्य यानि जो अपने आंतरिक व्यक्तित्व का विस्तार करना चाहता है – ‘अहम् से ब्रह्म्’ तक जाना चाहता है। सद्गुरु ऐसा कराने में सक्षम होते हैं।
दीक्षा केवल रूहानी होती है – गुरु की रूह का शिष्य की रूह से संबंध। दीक्षा के बाद शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु से लगातार ऊर्जा मिल रही है। शिष्य पर गुरु की लगातार नज़र है। मुरीद को भी गुरु के रूहानी स्वरूप के प्रति सदैव जागरूक रहना होता है। इस तरह दीक्षा उभय पक्षीय कर्म है; दोनों तरफ का दायित्व है। गुरु तो अपने दायित्व का निर्वाह करता रहता है। चूक शिष्य से ही होती है। लापरवाही शिष्य ही करता है।
दीक्षा बड़ी जिम्मेदारी है। गुरु-शिष्य दोनों की परस्पर 1/10 की हिस्सेदारी होती है। शिष्य के कर्मों का दसवां भाग गुरु को भोगना है। ऐसे ही गुरु के कर्म का इतना ही हिस्सा मुरीद को मिलता है। गुरु की तरफ से तो अच्छा ही मिलता है – ज्ञान की ऊर्जा मिलती है। संचित कर्म भोग कटते रहते हैं। गुरु से तो ऊर्जा ही मिलती रहती है। हम केवल सदगुरु की ही बात कर रहे हैं। विचलन करने वाले कथित गुरुओं की नहीं। उधर शिष्य तो सब तरह के होते हैं, इसलिए शिष्य के गैर रूहानी कर्मों का जो भार गुरु पर पड़ता है, उसे गुरु रूहानी शक्ति से काटता है। ऐसे शिष्य धीरे-धीरे गुरु की ऊर्जा तरंगों से ‘डी-लिंक’ हो जाते हैं।
विधिवत दीक्षा के लिए गुरु एक वर्ष तक दीक्षार्थी पर नज़र रखता है। उसकी सोच और संकल्प-विकल्प पर ध्यान रखता है। अंदर की कसक व निष्ठा को देखता है। फिर नाम दीक्षा देता है। ऐसे मुरीद पर आरम्भ से ही शक्तिपात हो जाता है। ऐसे मुरीद पर शुरू से ही शांभवी कृपा हो जाती है। ‘नाम’ आज्ञाचक्र पर धड़कता है, ध्यान लग जाता है, समाधि का अनुभव आरंभ हो जाता है। रूहानियत में तेज गति से चढ़ाई होने लगती है। ललाट के बिंदु पर ज्योति कौंधने लगती है। नशा सा बढ़ने लगता है। अन्य अनेक अनुभूतियां होने लगती हैं।
दीक्षा के बाद गुरु का दायित्व बढ़ जाता है। शिष्य का कर्तव्य बढ़ जाता है। दोनों प्रतिपल रूहानी तरंगों से जुड़े हुए रहते हैं। शिष्य के अंदर निश्चिंतता बढ़ जाती है। वह प्रफुल्लित रहने लगता है। गुरु से मनोसंवाद होने लगता है। रूहानी कसक कम होने या टूटने से गुरु-शिष्य के मध्य चेतन तरंग वाला ऐसा संबंध या जुड़ाव भी टूट जाता है। तब ‘चढ़ाई’ रुक जाती है ।
दीक्षा के अनेक प्रकार होते हैं। पूर्व जन्म के संचित संस्कारों के अनुसार ही दीक्षा का रूप तय होता है। अच्छी बात यह है कि आप किसी ‘सद्गुरु’ की शरण में पहुंच जाएं। पार तो सद्गुरु ही लगाता है।
अब एक सच्ची घटना – कोई युवक वृंदावन गया। एक महात्मा के आश्रम में पहुंच गया, फिर बोला – नाम दीक्षा चाहिए। महात्मा बोले, अरे! अभी खाओ-पियो, मौज-मस्ती करो; पैसा कमाओ। अभी नाम सुमिरन कैसे करोगे। दस-बारह साल बाद आना। कुछ समय पश्चात वह दूसरे संत के पास गया; नाम मिल गया। किंतु पैसे वाला स्वाद नही छूटा। इस कारण नाम बेस्वाद ही रह गया। रूहानी दीक्षा सबके भाग्य में नहीं होती है।