
यूँ हर समाज एक विशेष विचारधारा से पोषित होता है या कहें कि विचारधारा अपने उचित अनुचित प्रवाह से समाज को प्रभावित करती है। इस संदर्भ में जब भारतीय समाज पर विचार करते हैं तो यहाँ अनेक विचारधाराओं का अद्भुत संयोग है। सम्भवतः इसके मूल में यही वजह रही हो कि यहाँ समय -समय पर अलग-अलग विचार या धर्म के शासक रहे हों , लेकिन बड़ा भूभाग और पुरानी सभ्यता के चलते किसी भी एक विचार को एकमात्र बनने विचार का अवकाश नहीं मिला।
यही कारण रहा कि मार्क्स सरीखे चिंतन को यह कहना पड़ा कि भारत में चाहे जितने आक्रांत आए हो वे भले भूगोल पर विजय पा गए लेकिन संस्कृति सेहारते चले गए ।गांधी ने अपने समूचेजीवन को इसी समावेशी कर्मपथ पर ढाला।
हर युग में यह लगता रहा या लगता रहा होगा कि अब अमुक धर्म या प्रजाति ख़त्म हो जाएगी। ईसा पूर्व तीसरी सदी से लेकर ईसा बाद तक समय-समय पर वैष्णव, शाक्त, शैव, जैन, बौद्ध, द्रविड़, आर्य, वैदिक, तुर्क, अफ़ग़ान, इस्लाम , यूरोपीय सहित अनेक धार्मिक सत्ताएँ यही कोशिश करती रही कि समूचा समाज उनके अनुरूप हो लेकिन वह सब इसी भारतीय सभ्यता और संस्कृति में समा कर इसे उत्तरोत्तर समृद्ध करते रहे। जीवन, संस्कार, परम्पराएँ, उत्सव में एक अजीब सकारात्मक क़िस्म की समूहिकता रही। कहना ना होगा कि हिंदू भक्ति काल के स्वर्ण युग ( खुसरो, सूर, तुलसी, मीरा, रसखान,) इस्लामिक सत्ता-समय में उदित हुआ और आज़ादी का आंदोलन सभी धर्म, जाति, भाषाओं ने मिलकर लड़ा।जबकि इस समय भी धर्म के स्वमभू मसीहा सांस्कृतिक विखंडन के लिए नए नए मुखौटे धारण कर रहे थे और अंत में उनका मूल चेहरा किसी ना किसी भीड़ में खोकर अपने आप से शर्मिंदा होता था ।
कहने का लब्बोलुबाब है कि भारतीय जन मानस कुछ समय तक ज़रूर किसी विचार या धर्म विशेष के सम्मोहन में रह सकता। आख़िरकार, उसे भारतीय मूल की समावेशी आवधारना को ही अपनाना होता है ।संभवतः, यही वजह है कि पाकिस्तान की नकार अवधारणा के साथ खड़ा शायर इक़बाल को भारतीय संस्कृति के लिए कहना पड़ा “कुछ तो है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी..”
पिछले में हमनें देखा या देख रहे हैं कि समाज और संस्कृति को नए सिरे से एक रंग में रंगने की कोशिश की जा रही ह, लेकिन हम देख रहे वह विचार साथ ईद और नवरात्रा के मिलन से परास्त हो रहा है।यही हमारी सांस्कृतिक विजय है कि हम नफ़रत के हर स्वर को निस्तेज कर उसे स्मृति के पृष्ठों से मिटा देते हैं ।
*रास बिहारी गौड़*