उत्तम आर्जव स्तवन

हे अरिहंत प्रभु!

आपकी वाणी में जो सहजता है,

वही मेरे जीवन की राह बने।

न छल, न कपट, न दम्भ का भार,

आर्जव ही आत्मा का सच्चा श्रृंगार।

वक्रता में तो है केवल अँधेरा,

और सरलता में है मोक्ष का सवेरा।

सरल बने हृदय, निर्मल बने भाव,

सत्य की राह का हो जीवन पर प्रभाव।

हे जिनधर्म!

मुझमें इतना बल जगाओ,

हर परिस्थिति में सीधा चल पाऊँ,

कपट और धोखे से सदैव बच जाऊँ।

आर्जव का दीपक अंतर में जले,

सत्य और सरलता से जीवन ढले।

वंदन उस आर्जव भाव को,

जो कपट का अंधकार मिटाता है,

और आत्मा को मोक्ष-सूर्य से

सीधे जोड़ जाता है।

 

“राहत टीकमगढ़”

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