“सगठन सर्वोपरी”

दोस्तो,
कालेज कि जो स्थिति चल रही है उस पर अपनी प्रतक्रिया देना चाहता हुं कि जो भी हो रहा है अब लगता राजनिति में भी राज है। मालुम नही सभी संगठनो में “सगठन सर्वोपरी “कि बात अब भुल चुके है लगता है स्वार्थ सर्वोपरी हो रहे है।
इससे संगठनो को काफी नुकसान होता है। उन कार्यक्रर्ता को सबसे ज्यादा जो पार्टी कि नीवं कि ईट होते है।कल जिनका बोलबाला नही होता संगठन में कोई सहयोग या युं कहु संगठन के नही होने पर भी हमारे सिरमोर बना दिया जाता है इससे पार्टी के निष्ठावान कार्यक्रर्ता कि मानसीक मौत हो जाती है। जब उनकी मेहनत का लाभ कोई प्रर्यटक कार्यक्रर्ता ले लेता है । इन गतिविधीयो पर रोक होनी चाहीये।
दुसरा हर संगठन के उददेशय है सिद्वान्त होते है उन पर ही चले अौर उदाहरण प्रस्तुत करे। वरना हमारे छात्र व दुसरे राजनिति मे अंतर क्या रह जायेगा।
मेरे विचार है माने ना माने आखीर संगठन आप का आप संगठन के है।
-एडवोकेट दीपक पारीक

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