आर्कान्जेस्क सम्मेलन में आर्कटिक में माइक्रोप्लास्टिक की समस्या पर हुई चर्चा

आर्कान्जेस्कने आर्कटिक में कूड़ा-कचरा एवं माइक्रोप्लास्टिक पर एक सम्मेलन की मेजबानी की। 2021-2023 के दौरान आर्कटिक काउंसिल की रूस की चेयरमैनशिप के तहत आयोजित होने वाले प्रमुख कार्यक्रमों के तहत इस सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन रॉसकांग्रेस फाउंडेशन की ओर से किया गया।
रूस के विदेश मंत्रालय के अंतर्गत आर्कटिक को-ऑपरेशन के अम्बैस्डर-एट-लार्ज और सीनियर आर्कटिक ऑफिशियल्स के चेयरमैन निकोलय कोरचुनोव ने कहा, “माइक्रोप्लास्टिक की समस्या पूरी दुनिया केमहासागरों के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन आर्कटिक के लिहाज से इसका खास महत्व है। 2019 में आर्कटिक इंटरनेशनल साइंटिफिक एंड एजुकेशनल एक्सीडिशन के तहत आर्कटिक महासागर में माइक्रोप्लास्टिक्स को लेकर एक अध्ययन हुआ था। इस स्टडी के रिजल्ट में ये बातें सामने आईं कि माइक्रोप्लास्टिक्स बैरेंट्स सागर में भी हैं, जो आर्थिक औद्योगिक केंद्रों (इकोनॉमिक इंडस्ट्रियल सेंटर्स) से काफी दूर है।”
कोरचुनोव ने कहा कि यह समस्या उस इलाके में रहने वाले लोगों के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा करता है, खासकर नॉर्थ के मूल निवासियों के लिए। यहां ध्यान रखने वाली बात ये है कि नॉर्थ के मूल निवासियों का मुख्य व्यापार फिशिंग यानी मत्स्य पालन है।
उन्होंने कहा, “आर्कटिक क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से संबंधित मुद्दे मौजूदा एजेंडा से गायब नहीं हुए हैं। रूस का विदेश मंत्रालय रूस के वैज्ञानिकों और उनके विदेशी सहयोगियों के बीच संवाद स्थापित एवं विकसित करने के लिए हरसंभव मदद करने के लिए तैयार है। इस मामले में केवल आर्कटिक काउंसिल के सदस्य देश ही शामिल नहीं हैं। हम क्षेत्र में पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काउंसिल के पर्यवेक्षक देशों के साथ भी बातचीत के लिए तैयार हैं। इसके साथ-ही-साथ हम नॉन-आर्कटिक देशों के वैज्ञानिकों और एक्सपर्ट्स के साथ भी सहयोग विकसित कर रहे हैं क्योंकि आर्कटिक में पर्यावरण का मुद्दा एक तरह से वैश्विक है।”
फेडरेशन काउंसिल की कृषि एवं खाद्य नीति और पर्यावरण प्रबंधन की डिप्टी चेयरपर्सन येलेना ज्लेंको ने कहा कि केवल 2017 में ही विश्व ने 35 करोड़ टन प्लास्टिक प्रोड्यूस किया। उन्होंने कहा कि 2050 तक यह आंकड़ा एक अरब टन तक पहुंच सकता है। ज्लेंको ने कहा कि दुनिया के महासागरों का जलस्तर पांच लाख करोड़ से ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल्स की वजह से प्रदूषित हो गया है। एक अनुमान के मुताबिक, करीब आधे प्लास्टिक पानी से हल्के होते हैं और इस वजह से वे जल की सतह पर आ जाते हैं और पूरी दुनिया में फैल जाते हैं। ज्लेंको ने कहा कि समुद्री लहर कुछ इस प्रकास से आगे बढ़ते हैं जिससे आर्कटिक, आर्कटिक महासागर और बैरेंट्स सागर ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जहां प्लास्टिक आकर जमा हो जाए।
उन्होंने कहा, “माइक्रोप्लास्टिक से पैदा होने वाले प्रदूषण को चिह्नित करने और उनमें कमी लाने के लिए कई तरह के कदम उठाए जा सकते हैं।सतही जल निकायों को माइक्रोप्लास्टिक से बचाने के लिए हमें देश की पर्यावरण नीति में इसको लेकर खास जोर देने की जरूरत है। पॉलिमरोंकेप्रकार, साइज रेंजऔरअन्य फीचर्स के संकेत के साथ माइक्रोप्लास्टिक्स के कॉन्सेप्ट के लिए एक लेजिस्लेटिव फ्रेमवर्क तैयार करना जरूरी है।”
इसके साथ-ही-साथ ही समुद्री कचरे और प्लास्टिक के आर्कटिक महासागर के पानी में प्रवेश से रोकने के लिए उपायों पर चर्चा करना भी अहम है। ज्लेंको ने कहा, “संभवतः हमें आर्कटिक जोन में सिंग यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने के लिए बुनियादी फैसला लेने की जरूरत है।”
रूस के प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरण मंत्रालय के तहत काम करने वाले डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट पॉलिसी एंड रेग्युलेशन इन इंडस्ट्रियल एंड कंज्मशन वेस्ट मैनेजमेंट के डिप्टी डायरेक्टर बोरिस फ्रांट्सुजोव ने कहा कि नियामकीय दृष्टिकोण से इस क्षेत्र की समस्याओं से निपटते वक्त आर्कटिक जोन की खासियतों पर भी गौर करना जरूरी है। 2022 में विभाग आर्कटिक जोन में वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर इकोलॉजी यूरल्स रिसर्च इंस्टीट्युट के वैज्ञानिक शोध कार्यों के रिजल्ट की प्रतीक्षा कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित एक कार्यकारी समूह (वर्किंग ग्रुप) शोध कार्यों के परिणाम पर चर्चा करेगी। इसके साथ ही साथ समूह नियमों में बदलाव को लेकर प्रस्ताव तैयार कर सकता है।
फ्रांट्सुजोवने कहा, “अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दिखाते हैं कि हर तरह के जरूरी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी चीजों को धीरे-धीरे सीमित किए जाने की जरूरत है जो पर्यावरण के अनुकूल नहीं हैं: पर्यावरण के लिहाज से जो चीजें अनुकूल नहीं हैं, वैसी सामग्रियों से बने सामान और पैकेजिंग के एनालॉग्स की अवेलेबलिटी, उनके प्रोडक्शन के लिए कच्चे माल और टेक्नोलॉजी की उपलब्धता, और छोटे एवं मझोले बिजनेस सहित नई परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने के बदलाव वाले काल।”
कॉन्फ्रेंस में आर्कटिक में पर्यावरण से जुड़े एजेंडा के विभिन्न पहलुओं पर तीन सत्रों का आयोजन हुआ। सत्र में हिस्सा लेने वालों ने नेशनल इकोलॉजी प्रोजेक्ट, आर्कटिक क्षेत्र में कचरा प्रबंधन और पर्यावरण को हुए नुकसान को दुरुस्त करने के तरीकों पर चर्चा की और इसके साथ-ही-साथ शहरों के कूड़ा-कचरा के प्रबंधन के सबसे अच्छे तरीकों पर गौर किया और इंटरनेशनल कंवेन्शन एवं पर्यावरण से जुड़े प्रोटोकॉल के प्रावधानों को लागू करने की भी बात की।उन्होंने क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन, महासागर से प्रदूषण के खात्मे और सिंथेटिक पॉलिमर पार्टिकल्स के प्रसार के विभिन्न पहलुओं पर भी बात की।

कॉन्फ्रेंस का आयोजन नॉर्दर्न (आर्कटिक) फेडरल यूनिवर्सिटी में किया गया। इसका आयोजन प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा किया गया।
जलवायु परिवर्तन सहित पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे 2021-2023 के दौरान आर्कटिक काउंसिल की रूस की चेयरमैनशिप के तहत शीर्ष प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शामिल हैं। परमाफ्रॉस्ट के क्षरण और गैस हाइड्रेट्स के उत्सर्जन सहित आर्कटिक में जलवायु में तेजी से हो रहे बदलावों को देखते हुए रूस का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों को कम करने का प्राथमिक लक्ष्य आने वाले समय में लाइफ-सस्टेनिंग एक्टिविटीज के साथ-साथ लचीलता अपनाने, पर्यावरण के सरंक्षण और रिस्टोर करने, टिकाऊ तरीके से प्राकृतिक संसाधन के इस्तेमाल और आर्कटिक इकोसिस्टम के हेल्थ को सपोर्ट करने से जुड़ा हुआ है। इनमें समुद्र का पर्यावरण और जैवविविधता और खासकर प्रवासी पक्षियों का संरक्षण शामिल है।

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