आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी की चर्चा में शामिल हुए भारत और अफगानिस्तान

विकासशील देशों में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों पर आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी की चर्चा में शामिल हुए भारत और अफगानिस्तान
दुनिया की 50 फीसदी आबादी आज भी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं से है वंचित

जयपुर, 23 फरवरी, 2021ः विकासशील देशों में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों पर चर्चा के लिए आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी ने हाल ही एक वेबिनार आयोजित किया। इस वेबिनार का आयोजन एसडी गुप्ता स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (एसडीजी-एसपीएच) के तत्वावधान में किया गया। आईआईएचएमआर के ट्रस्टी सचिव डॉ. अशोक अग्रवाल, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉ. फिरोजुद्दीन फिरोज, आयुष्मान भारत के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डॉ. इंदुभूषण, आईएएस, आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी के चेयरमैन डॉ. एस डी गुप्ता और आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेंट डॉ. पी आर सोडानी ने इस चर्चा में भाग लिया। डॉ. डी. के. मंगल, प्रोफेसर, और डीन (रिसर्च), सलाहकार, एसडी गुप्ता स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी ने सत्र का संचालन किया।

वेबिनार के दौरान विकासशील देशों में स्वास्थ्य कवरेज के महत्व पर महत्वपूर्ण चर्चा की गई और दुनिया भर में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बुनियादी पहुंच की आवश्यकता से संबंधित चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया।

वेबिनार में विचार व्यक्त करते हुए आईआईएचएमआर के ट्रस्टी सचिव डॉ. अशोक अग्रवाल ने कहा, ‘‘सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉ. एस डी गुप्ता के योगदान को सम्मानित करने के लिए ही एसडी गुप्ता स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की शुरुआत की गई है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोगों को प्रशिक्षित करने और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना करने के उद्देश्य के साथ इसे शुरू किया गया था। यह संगठन छात्रों को सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अग्रणी और विशेषज्ञ बनाते हुए उन्हें विश्व स्तर पर स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार के लिए समर्पित करना चाहता है।’’

इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉ. फिरोजुद्दीन फिरोज ने कहा, ‘‘दुनिया भर में आज भी 50 फीसदी से अधिक लोग आवश्यक, गुणवत्तापूर्ण और किफायती स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 930 मिलियन से अधिक लोगों को या दुनिया की 12 फीसदी आबादी को स्वास्थ्य संबंधी देखभाल के लिए अपने घरेलू बजट का कम से कम 10 फीसदी हिस्सा खर्च करना होता है। यूनिवर्सल हैल्थ कवरेज के जरिये ही हम अपने सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स को हासिल कर सकते है, क्योंकि यूनिवर्सल हैल्थ कवरेज संवर्धन, रोकथाम, उपचार और पुनर्वास पर केंद्रित है। यूनिवर्सल कवरेज का मतलब लागत की परवाह किए बिना सभी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए मुफ्त कवरेज नहीं है, दरअसल यह स्वास्थ्य प्रणालियों, स्वास्थ्य सेवा वितरण, स्वास्थ्य कार्यबल, स्वास्थ्य सुविधा और कम्युनिकेशन नेटवर्क के साथ-साथ गवर्नेंस से संबंधित भी है। जब तक हम समानता को हासिल नहीं करते, तब तक यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज में सुधार नहीं किया जा सकता है।’’

यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज को वैज्ञानिक मानदंडों, देश में रोगों के प्रकोप, लागत-प्रभावशीलता के अध्ययन और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी के आकलन के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए।
आयुष्मान भारत के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डॉ. इंदुभूषण, आईएएस ने इस अवसर पर कहा, ‘‘2000 के दशक से भारत ने स्वास्थ्य संकेतकों के लिहाज से बहुत प्रगति की है। शिशु मृत्यु दर में 51 प्रतिशत की गिरावट आई है और मातृ मृत्यु दर में भी 61 प्रतिशत की गिरावट हुई है। साथ ही और एमबीबीएस के लिए सीटों की संख्या तीन गुना हो गई है यानी 242 प्रतिशत तक बढ़ोतरी। 2006 में एमबीबीएस की सीटों की संख्या 25,058 थीं जो अब बढ़कर 85,726 हो गई हैं। इस दौरान हमने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में 80 प्रतिशत की वृद्धि देखी है और जीवन प्रत्याशा में भी 9 फीसदी की वृद्धि हुई है।’’

डॉ. इंदुभूषण ने आगे कहा, ‘‘2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए यूएचसी का मार्गदर्शन कर रहा है। कोविड-19 महामारी के बाद उपजे हालात ने स्वास्थ्य सेवा के प्रति हमारी जागरूकता को मजबूत किया है जहाँ हम तेजी से बुनियादी ढाँचे में सुधार, नीतिगत सुधार, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता अभियानों में वृद्धि, संक्रामक रोग निगरानी कार्यक्रम को बढ़ाने, डिजिटल अभिनव समाधानों को अपनाने, स्वच्छता मानकों में सुधार के लिए जोर देने लगेे हैं। साथ ही, शोध प्रक्रियाओं के लिए और अधिक प्रयास करने के साथ-साथ स्वास्थ्य पर वैश्विक सहयोग को और बढ़ाने और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की क्षमता निर्माण पर भी फोकस बढ़ गया है।’’

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में 2025 के लिए निर्धारित किए गए प्रमुख लक्ष्यों में 70 की उम्र तक जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, नवजात शिशु की मृत्यु दर को एक अंक तक ले आना, समय से पहले मृत्यु दर को 25 प्रतिशत तक कम करना, जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के रूप में सरकार की ओर से स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि करना और एकीकृत स्वास्थ्य सूचना प्रणाली की स्थापना करना इत्यादि शामिल हैं। यूएचसी के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, भारत को स्वास्थ्य सेवाओं के अपर्याप्त वितरण, मानव संसाधनों की सीमित उपलब्धता, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं की कमी और विषमता और स्वास्थ्य सूचना तक पहुंच में कमी, स्वास्थ्य देखभाल की कम क्षमता और खराब गुणवत्ता जैसी कई चुनौतियों का सामना करना होगा।

वेबिनार में आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी के चेयरमैन डॉ. एस डी गुप्ता ने कहा, ‘‘एसडी गुप्ता स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (एसडीजी-एसपीएच) की शुरुआत एक ऐसी संस्था के रूप में की गई है, जो सिद्धांतों में महारत हासिल करने पर नहीं, बल्कि व्यवहार में इन सिद्धांतों को प्रसारित करने पर केंद्रित है। संस्था सार्वजनिक स्वास्थ्य में नए क्षेत्रों की खोज करेगी और एक अग्रणी विचारक के रूप में उभरेगी।’’

डॉ. डी. के. मंगल, प्रोफेसर, और डीन (रिसर्च), सलाहकार, एसडी गुप्ता स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, आईआईएचएमआर यूनिवर्सिटी सत्र का संचालन करते हुए कहा, ‘‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज यह सुनिश्चित करता है कि वित्तीय कठिनाइयों का सामना किए बिना लोग स्वास्थ्य सेवाओं को हासिल कर सकें। सही पूछा जाए तो यह अत्यधिक निर्धनता को दूर करते हुए समानता को बढ़ाने और साझा समृद्धि को हासिल करने के दोहरे उद्देश्य को पूरा करने की कुंजी है। लक्ष्य 3 और लक्ष्य 3.8 सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को प्राप्त करना है और इसमें वित्तीय सुरक्षा और गुणवत्ता वाली आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं और सस्ती दवाओं और सभी के लिए टीके शामिल हैं। हर साल लगभग 90 मिलियन लोग स्वास्थ्य खर्च के कारण निर्धनता का शिकार होते हैं, हालांकि यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज में तेजी आई है।’’

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