यूपी में नई चीनी मिलों की राह नहीं आसान

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को राहत पहुंचाने के लिए तैयार नई चीनी नीति निवेशकों को लुभा पाएगी, इसे लेकर शंका जताई जा रही है। मिलों के लिए पेराई को पर्याप्त गन्ने की उपलब्धता और गुणवत्ता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

वहीं, गन्ना किसानों की सियासत के उलझाव भी परेशानी का सबब हैं। नई नीति के तहत 24 जिलों में चीनी मिलों के निर्माण के लिए खास रियायतें दी जाएंगी। निवेशकों को पांच फीसद ब्याज पर कर्ज, गन्ना खरीद टैक्स से छूट, सोसायटी कमीशन प्रतिपूर्ति, देसी मदिरा को शीरा आरक्षण, प्रशासनिक शुल्क, स्टाम्प ड्यूटी व भूमि रजिस्ट्री शुल्क छूट जैसी कई सुविधा मिलेंगी।

इसके अलावा शीरा य-विक्त्रय पर टैक्स में विशेष स्थिति में राहत मिलेगी। गन्ना उत्पादन के आंकड़े देखे तो वर्ष 2007 में जहां 1586.22 मीट्रिक टन गन्ना पैदा हुआ, वहीं 2012 में यह घट कर 1335.72 रह गया। गन्ने की कमी के कारण मौजूदा मिलें क्षमता का केवल 50 फीसद ही पेराई कर रही हैं। साथ ही पेराई सत्र 140 दिनों से घटकर 120 दिन रह गया। जिन क्षेत्रों में चीनी मिलें लगाने को रियायत पैकेज प्रस्तावित है, उसमें अधिकतर क्षेत्र गन्ने के लिए अनुकूल नहीं है। खासकर बुंदेलखंड के जिलों में पर्याप्त सिंचाई प्रबंध न होना बड़ी बाधा है। अन्य प्रदेशों की तुलना में यूपी के गन्ने की गुणवत्ता कमतर है। देश में रिकवरी औसत 10.17 फीसद है तो यूपी के गन्ने से 9.10 फीसद से अधिक रिकवरी नहीं मिलती।

यही वजह है कि देश का 43 प्रतिशत गन्ना उपजाने वाले यूपी का चीनी उत्पादन में हिस्सा महज 24 फीसद है। गन्ने का मूल्य बढ़ाकर किसान राजनीति में बढ़त की होड़ से भी मिलों का वित्तीय संतुलन गड़बड़ाया है। इससे भुगतान विवाद बड़ी समस्या बनती जा रही है।

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