स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (एसएमए) से पीड़ित मरीज़ों और उनके परिवारों का समग्र देखभाल के माध्‍यम से मल्टीडिस्कप्लिनरी केयर

जयपुर, 2024: कुछ वर्षों से भारत में रेयर डिसीसेस के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है और इससे पीड़ित मरीज़ों और उनकी देखभाल करने वालों द्वारा सामना की जानेवाली चुनौतियों के बारे में जानकारी सामने आई है। दुनिया भर में रेयर डिसीसेस के करीब एक तिहाई मामले भारत में पाए जाते हैं जिसमें से केवल 450 से अधिक रोगों की पहचान की गई है। हालांकि, हमारे देश में रेयर डिसीसेस के लिए एक मानक परिभाषा उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक अनुमान के अनुसार करीब 8 करोड से 10 करोड भारतीय किसी न किसी रेयर डिसीसेस से पीड़ित हैं जिसमें बच्चों की संख्या 75% है।
स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (SMA) एक रेयर डिसीस है जो रीढ़ की हड्डी में मोटर न्यूरॉन्स को प्रभावित करता है। यह एक आनुवांशिक विकार है और सारी दुनिया में शिशुओं की मृत्यु के लिए सबसे प्रमुख कारणों में से एक है। इस रोग के परिणामस्वरूप मांसपेशियाँ धीरे धारे कमज़ोर होती जाती हैं और आगे चलकर मरीज़ का हिलना-डुलना और गतिविधियाँ पूरी तरह बंद हो जाती हैं। SMA एक ऐसी बीमारी है जो गंभीर चुनौतियाँ पेश करती है, चाहे वह शारीरिक, भावनात्मक, सामाजिक या वित्तीय हो । समय से इसका निदान और हस्‍तक्षेप न किया जाए तो ज़्यादातर मरीज़ दो साल से अधिक जीवित नहीं रह पाते हैं। और जिन मामलों में वे जीवित रहते हैं, उनके जीवन की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो जाती है।
विशिष्ट प्रकार के आधार पर एसएमए की तीव्रता अलग अलग हो सकती है। इसमें से टाइप 1 प्रकार को सामान्य रूप से इस रोग का सबसे खतरनाक रूप माना जाता है। इसके सामान्य लक्षणों में शामिल है श्वसन संबंधी बीमारियाँ जैसे श्वसनतंत्र से जुड़ी मांसपेशियाँ में कमज़ोरी और साँस लेने में कठिनाई। निगलने में भी दिक्कतें आ सकती हैं जिस वजह से भोजन कराना जटिल हो जाता है। टाइप 1 एसएमए से पीड़ित मरीज़ों में विशेष रूप से स्कोलियोसिस यानी रीढ़ का एक ओर का टेढापन पाया जाता है। रीढ़ में आई वक्रता या टेढेपन की वजह से फेफड़ों का विस्तार सीमित हो जाता है जिससे साँस लेना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। चलना-फिरना कम हो जाने की वजह से जोड़ों में अकड़न या इनके विस्थापित हो जाने जैसी समस्या आती है और कूल्हे प्रभावित हो जाते हैं। जबकि संवेदी और संज्ञानात्मक लक्षण दिखाई दे सकते हैं लेकिन एसएमए के ज़्यादातर मामलों में संज्ञानात्मक कार्य प्रभावित नहीं होते हैं।
डॉ. अशोक गुप्ता, निदेशक, दुर्लभ रोग संस्थान, महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्याय महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के दुर्लभ रोग संस्थान के निदेशक डॉ. अशोक गुप्ता ने एसएमए के प्रबंधन के लिए सहयोगात्मक दृष्टिकोण के महत्व के बारे में बात की और कहा कि “एसएमए का शिशुओं और उनके देखभाल करने वालों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। एसएमए, विशेष रूप से टाइप 1 का रोगियों और उनके परिवारों पर शारीरिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। श्वसन संबंधी संघर्ष और मांसपेशियों की ताकत से जुड़ी कठिनाइयों के लिए तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता होती है। एसएमए के प्रबंधन के लिए एक बहुविषयक दृष्टिकोण की भी आवश्यकता होती है, जिसमें समय पर फिजियोथेरेपी हस्तक्षेप, पोषण संबंधी सहायता और श्वसन प्रबंधन शामिल है। रोगियों के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए डॉक्टरों, चिकित्सकों और सहायता समूहों के बीच व्यापक और सहयोगात्मक देखभाल प्रयास अनिवार्य हैं।
डॉ. प्रियांशु माथुर, रेयर डिजीज के राज्य नोडल अधिकारी, एसोसिएट प्रोफेसर, बाल चिकित्सा, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर ने रेयर डिजीज के प्रबंधन के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के महत्व के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि, “पोषण संबंधी सहायता एसएमए के प्रबंधन का अभिन्न अंग है, जो वृद्धि और विकास को अनुकूलित करने के साधन के साथ रोग की प्रगति को कम करने की रणनीति के रूप में भी काम करता है। एसएमए से पीड़ित बच्चों को दूध पिलाने में कठिनाई, कम वजन बढ़ना और मांसपेशियों की कमजोरी और निगलने में कठिनाई के कारण पोषण की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हमारे दृष्टिकोण में व्यक्तिगत पोषण मूल्यांकन शामिल है, जिसमें विशेष भोजन तकनीक और मौखिक पूरक शामिल हैं। एसएमए से पीड़ित बच्चों में पूर्ण विकास और कार्य का समर्थन करने के लिए भोजन संबंधी मुद्दों को संबोधित करने और पर्याप्त पोषण सेवन सुनिश्चित करने के लिए बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट के साथ नियमित चर्चा आवश्यक है।
एसएमए मरीज़ों और अन्य दुर्लभ रोगों से जूझ रहे मरीज़ों के लिए एक बहुविषयक एवं व्‍यापक देखभाल का उद्देश्य मरीज़ों के जीवनकाल को बढ़ाना है और इसके साथ ही इसे समृद्ध करना है। शारीरिक थेरैपी, पोषण और भावनात्मक सहायता का मिश्रण न केवल लक्षणों का उपचार करता है, लेकिन इसके साथ ही यह मरीज़ों को गरिमा और देखभाल प्रदान करता है और उनके रोज़मर्रा के जीवन की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण रूप से सुधार लाने के लिए कार्य करता है।

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