बिन पानी सब सून

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून | अगर चौथा विश्वयुद्ध होगा तो वो पानी को लेकर होगा | तो पानी को लेकर कभी कबीर दास जी ने सोचा तो कभी आधुनिक दौर मे आइंस्टीन जी ने भी चेताया और अपनी चिंताए जाहीर की | अगर पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता की ही कमी होती है … Read more

राजनीति में माफी मांगने का बढ़ता प्रचलन

राजनीति में इनदिनों माफी मांगने का प्रचलन बढ़ रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने इस प्रचलन को हवा दी है, वे माफी मांगने वाले शीर्ष पुरुष बन गये हैं। देशभर में खुद पर दर्ज तकरीबन चालीस से अधिक मानहानि के मुकदमों से निपटने के लिए उन्होंने माफी मांगने की शुरुआत की है। काफी … Read more

देश की मुआवजे की राजनीति पर… खांटी खड़गपुरिया की चंद लाइनें

सरकार की इस अदा पर मरने को जी करता है जीते जी नहीं थे काम के पर मरने पर लाखों का चेक कटता है जिंदा थे तब नहीं थी फुर्सत तबियत पूछने की ज्यों मरे तो लंबा जुलूस निकलता है जहालत भरी जिंदगी के दरम्यांन शक्ल देखना भी नहीं था गवारा मयखाने में मर गए … Read more

क्या बात है माँ?

आज अचानक तुम इतनी उदास कैसे हो गई? पूछते हुए मैंने माँ के कंधे पर हाथ रखा और आंखों में देखा। मगर यह क्या! आज वह तेज़, हौसला, साहस कहाँ खो गया, जो हर रोज मैं उनकी आंखों के सहारे स्वयं में भरती आई हूँ। क्या बात है माँ, आज आप इतनी हताश कैसे नजर … Read more

मैं दौड़ती सरपट

रोज़ की तरह आज भी घर से निकलते निकलते देर हो गई थी कॉलेज जाने को बस जो पकड़नी थी लेकिन क्या करूँ ये रोजमर्रा के काम पीछा ही नही छोड़ते।पहले तो सब को उठाने के लिए मुर्गे की तरह बांग देनी पड़ती है , फिर नवाब साहब पतिदेव को बेड टी सप्लाई करनी होती … Read more

दादा पंडित राम नारायण उपाध्याय : स्वर्णिम स्मृतियों से

ये उस समय की बात है जब कंप्यूटर को वातानुकूल में ही रखा जाता था और उसे छुने के लिए भी पहले हतेलियों से धूल झटकनी पड़ती थी। सदी बदल रही थी इक्कीसवीं सदी का प्रारम्भ था बात होगी सन 1999 – 2000 की अब मैं भावनाओं को बहुत अच्छे से समझने लग चुका था। … Read more

बचपन को लीलता होमवर्क का बोझ

छुट्टियां यानी बच्चों के मौज-मस्ती और सीखने का मौसम होता है, जो अब स्कूलों से मिलने वाले होमवर्क के बोझ तले मुरझा रहा है। बेहतर व आधुनिक शिक्षा के नाम पर बच्चों पर आवश्यकता से अधिक होकवर्क का बोझ उनके कोमल मन मस्तिष्क के लिए हानिकारक एवं विडम्बनापूर्ण साबित होता जा रहा है। खिलता बचपन … Read more

लोकतंत्र में हिंसा की संस्कृति के दाग

भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसको सशक्त बनाने की बात सभी राजनैतिक दल करते हैं, सभी ऊंचे मूल्यों को स्थापित करने की, आदर्श की बातों के साथ आते हैं पर सत्ता प्राप्ति की होड़ में सभी एक ही संस्कृति-हिंसा एवं अराजकता की संस्कृति को अपना लेते हैं। मूल्यों की जगह कीमत … Read more

भिक्षावृत्ति और शिक्षावृत्ति

गुरुजी की धर्म पत्नी बोली-‘‘ तुम हमेशा स्कूल से विलम्ब से आते हो , ओव्हर टाईम करते हो पर निश्चित वेतन के अतिरिक्त ओव्हर टाईम कभी नहीं लाते।‘‘ गुरुजी बोले-‘‘शासन ने ओव्हर टाईम का काम तो जारी रखा है, परन्तु ओव्हर टाईम का भुगतान प्रतिबंधित कर रखा है। ‘‘ कुछ सेवा निवृत्त हो गए , … Read more

वाह कोलकाता. आह कोलकाता .!!

तारकेश कुमार ओझा देश की संस्कारधानी कोलकाता पर गर्व करने लायक चीजों में शामिल है फुटपाथ पर मिलने वाला इसका बेहद सस्ता खाना। बचपन से यह आश्चर्यजनक अनुभव हासिल करने का सिलसिला अब भी बदस्तूर जारी है । देश के दूसरे महानगरों के विपरीत यहां आप चाय – पानी लायक पैसों में खिचड़ी से लेकर … Read more

भारतीय न्यायपालिका

आज समाचारों में माननीय उच्चतम न्यायालय से दो ख़बरें एक बार फिर न्यायपालिका की विश्वशनियता की और एक दृढ़ कदम की ओर इशारा करती हुई दिखाई दी ! पहली उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्य मंत्रियों को मुफ़्त आवास से वंचित करने का आदेश दू जिसके द्वारा 6 पूर्व मुख्य मंत्रियों को सरकारी बंगलों से बेदखल … Read more