बीकानेर 12/2/17 ( मोहन थानवी ) । टूरिस्ट होटलों में यूं तो प्राय: देशी-विदेशी विभिन्न बोलियों-भाषाओं के स्वर गूंजते हैं मगर 12 फरवरी को बसंतोत्सव के माहौल में सराबोर छोटी काशी सदृश्य बीकाणा नगरी के होटल ढोला-मारू में बहुभाषायी लय-ताल की गूंज पर भारतीय संस्कृति मानो स्वयं नाद करने लगी। काव्योत्सव के रंग में डूबे कवियों ने मानवीय संवेदनाओं को उकेरते हुए जहां खुशी के फूल बरसाए वहीं बंगाली; पंजाबी; डिंगल; उर्दू; राजस्थानी; सिंधी; हिंदी; अंग्रेजी आदि विभिन्न भाषाओं की कविताओं से विविध प्रांतीय लोक जीवन को दृश्यमान बना सुधीजनों से वाह-वाही प्राप्त की। जी हां; हम आपको बता रहे हैं मुक्ति संस्था के मेरे आंगन कार्यक्रम के तहत हुए भारतीय भाषाओं का कविता-उत्सव के बारे में । कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन में कहानीकार-व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि बीकानेर शहर की गरिमा में इस बात को भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि यहां न केवल राजस्थानी, हिंदी और उर्दू वरन अन्य भारतीय भाषाओं में भी लेखन हो रहा है। मुख्य अतिथि प्रसिद्ध सामाजसेवी और राजस्थानी लोक संस्कृति के विद्वान भंवर पृथ्वीराज रतनू ने स्मरण करवाया कि डिंगळ और राजस्थानी की समृद्ध परंपरा हमारे यहां रही है और भाषाओं की विविधता में कविता अपने भीतर नाद की जो झांकी श्रवण से प्रगट करती है उसके लिए भाषा के बंधन नहीं होते। उन्होंने कार्यक्रम में पठित कविताओं पर हर्ष प्रकट करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि आज के कार्यक्रम में एक छोटा भारत अपनी विविधताओं को एकता के सूत्र में पिरोकर यहां प्रस्तुत किया गया है।
कार्यक्रम में पठित कविताओं पर आलोचनात्मक टिप्पणी के अंतर्गत प्रख्यात साहित्यकार पत्रकार मधु आचार्य आशावादी ने कहा कि कविता दिखने में जितनी सहज और सरल होती है वह उतनी ही जटिल और गुंफित विन्यास की मांग करती है। विभिन्न भारतीय भाषाओं की कविताओं को उनमें प्रस्तुत भाव और संवेदनाएं ही वे घटक हैं जो उन्हें दूर तक ले जाने में सक्षम है।
कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने कहा कि कोई कवि जिस किसी भी भाषा में लिखता हो उसे अपनी परंपरा,लोक-साहित्य और समकालीन साहित्य से अच्छा खासा परिचय रखना चाहिए, अन्यथा वह कुछ रचते हुए भी कुछ नवीन अवदान नहीं दे सकता।
आए हुए कवियों और आगंतुक सुधि श्रोताओं का स्वागत करते हुए हिंगलाज रतनू ने कहा कि हर्ष का विषय है कि इस प्रांगण में इतने कवि विभिन्न भाषाओं की काव्य रचनाओं के साथ उपस्थित हुए हैं जो निश्चय ही हमारे आस्वाद का विस्तार करने वाले हैं। कार्यक्रम के संयोजक और कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने कार्यक्रम के विषय में विस्तार से जानकारी देते हुए मुक्ति संस्थान द्वारा मेरे आंगन कार्यक्रम की अवधारणा को स्पष्ट किया वहीं विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए बीकानेर के साहित्यकारों के अवदान को भी रेखांकित किया।
हिंदी कवि नवनीत पाण्डे ने ‘आसमान में घोंसला तो नहीं बना सकते’, ‘सोचो राजन सोचो !’ एवं ‘वसंत’ गीत प्रस्तुत कर माहौल को कविता मय कर दिया। लेखक आत्माराम भाटी ने राकेश टी. कांतिवाल द्वारा किया हुआ कवि डॉ.नीरज दइया की राजस्थानी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद कार्यक्रम में प्रस्तुत किया। वहीं डिंगळ के प्रमुख हस्ताक्षर गिरधर दान रतनू ‘दासोड़ी’ ने अपनी राजस्थानी और डिंगळ कविताओं के माध्यम से नई ऊर्जा और ओज का संचार किया। ‘सुरराज करी गजराज सवारिय, मौज वरीसन आज मही।’ के साथ बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं कविताओं को श्रोताओं ने पसंद किया।
उर्दू के शायर वली गौरी ने अपने अलग अंदाज में गजल के हर शेर पर दाद बटोरते अमन और भाईचारे का संदेश दिया। कवयित्री डॉ. मंजू कच्छावा ने पंजाबी में दो गजलों को तरन्नुम के साथ प्रस्तुत किया । सिंधी कवि साहित्यकार मोहन थानवी ने वर्तमान हालात पर संस्कारों और अपनेपन की बात की। थानवी की कविताओं में सिंधी संस्कृति की हवा का एक झौंका और आंगन में ऊर्जा देती जलती अग्नि का दृश्य जैसे कविता में साकार हो उठा। बंगाली भाषा की कविता प्रस्तुत करते हुए कवयित्री सुश्री पूर्णिमा मित्रा ने एक दिन की झलक प्रस्तुत की वहीं अपने कुछ अनुभव भी श्रोताओं के बीच साझा किए।
हिंदी गीत के अंर्तगत वसंत के आगमन को अपनी सुरीली आवाज में कवयित्री डॉ. रेणु व्यास ने साझा किया तो राजस्थानी कवि गौरीशंकर प्रजापत ने जीवन और समाज के गूढ रिश्तों काे कविता में रेखांकन करते हुए खुलासा किया। राजस्थानी और डिंगळ कविताओं के पाठ के अंतर्गत कवि कवि जगदीश रतनू, साहित्यकार मोईनूद्दीन कोहरी, कवि कैलाश रतनू ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि सरदार अली परिहार, मुनीन्द्र अग्निहोत्री, राहुल रंगा ‘राजस्थानी’, शंकरलाल व्यास, नदीम अहमद नदीम आदि अनेक श्रोता उपस्थित रहे। आभार कवि नाटककार हरीश बी. शर्मा ने प्रकट किया।