
बचपन में ही पितृभक्ति और सत्यनिष्टा को अपनाने का सकंल्प लिया
बचपन में अपने पिता की किताब “श्रवण-पितृभक्ति नाटक” को पढ़ा | उन्हीं दिनों शीशे मे चित्र दिखाने वाले भी घर-घर आते थे। उनके पास भी श्रवण का वह दृश्य भी देखा, जिसमें वह अपने माता-पिता को कांवर में बैठाकर यात्रा पर ले जाता हैं। इस चित्र को उन्होंने बार बार देखा और श्रवण के चरित्र का उन पर अत्याधिक प्रभाव पढ़ा | बापू कहते थे कि इन दोनों चीजों का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। मन में इच्छा होती कि मुझे भी श्रवण के समान बनना चाहिए। इन्हीं दिनों कोई नाटक कंपनी आयी थी और उसका नाटक देखने की इजाजत मुझे मिली थी। उस नाटक को देखते हुए मैं थकता ही न था। सत्यवादी हरिशचन्द के जीवन से गांधीजी प्रभावित हुए और वो कहते थे कि मन ही मन मैने उस उस नाटक को सैकड़ो बार खेला होगा। उन्होंने इस सच्चाई को जान लिया कि सत्यवादी को अनेकों विपत्तियां का सामना करना पड़ेगा |
वास्तविकता में सत्यादी हरिश्चंद्र के सच बोलने की प्रेरणा और माता-पिता के प्रति श्रवण कुमार की प्रगाढ़ श्रद्धा ने गांधी जी को पूरे जीवन भर प्रभावित किये रखा और उन्हें पूरी दुनिया में महामानव बना दिया।
मतलब की चीज को सम्भाल कर रक्खों
एक अंग्रेज ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा। उसमें गालियों के अतिरिक्त कुछ था नहीं। गांधीजी ने पत्र पढ़ा और उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। उसमें जो आलपिन लगा हुआ था उसे निकालकर सुरक्षित रख लिया। वह अंग्रेंज कुछ दिनों बाद बापूजी से मिलने के लिए आया और आते ही उसने पूछा- महात्मा जी! आपने मेरा पत्र पढ़ा या नहीं?
महात्मा जी बोले- बड़े ध्यान से पढ़ा है। उसने फिर पूछा- क्या सार निकाला आपने? महात्मा जी ने कहा- एक आलपिन निकाला है। बस, उस पत्र में इतना ही सार था। जो सार था, उसे ले लिया। जो असार था, उसे फेंक दिया।
सकंलनकर्ता—- डा. जे.के. गर्ग