अजमेर पोएट्स कलेक्टिव की मासिक गोष्ठी में युवा कवियों ने बटोरी प्रशंसा

जयपुर//बोधि प्रकाशन सुदर्शनपुरा जयपुर के सभागार में आयोजित अजमेर पोएट्स कलेक्टिव की मासिक गोष्ठी कई मायनों में विशिष्ट रही। किसी भी काव्य गोष्ठी में केवल कविता सुनना या सुनाना ही महत्वपूर्ण गतिविधि नहीं होती है बल्कि वहां मिलने वाला सुकून उसे विशिष्टता प्रदान करता है। ऐसा आत्मीयतापूर्ण माहौल कि जहां हर कोई सिर्फ सुनाने की जल्दी और जुगत में नहीं हो बल्कि दूसरों को सुनने के लिए भी उत्साहित रहते हों । इस लिहाज़ से अजमेर पोएट्स कलेक्टिव की मासिक गोष्ठी बहुत ही समृद्ध होती है। इस बार भी सभी मित्रों ने एक दूसरे को जी भर के सुना। और श्रोताओं की फरमाइश पर मंच पर सुंदर कविताएं रस माधुर्य बरसाती रहीं।

आज के मासिक गोष्ठी की शुरूआत मनीष मिश्रा ‘मणि’ ने “ग़ैर बेवज़ह ही बदनाम हैं सारे, अपनों को भी कभी आज़मां के देख’ इस खूबसूरत ग़ज़ल से की। उसके बाद अर्चना जैन ने प्रेम और इस बदलते हुए मौसम पर दो बहुत ही खूबसूरत कविताएं सुनाई। शशि पाठक ने उम्र के साठ पड़ाव पार करने के बाद फिर से कलम थामी है और खूब थामी है। वे अपनी बेहतरीन कविताओं से मन मोह लेती हैं।

नूतन गुप्ता भी रिटायर् होने के बाद अपने अनुभव और एहसास कविताओं के माध्यम से हमारे सामने रख रही हैं। उन्होंने आत्मकथा कविता सुनाई-‘ये किताब बहुत पुरानी है, इसकी ज़िल्द कई बार बदली जा चुकी है।” सुनीता बिश्नोलिया ने ‘पूस की रात’ मार्मिक कविता सुनाकर सबको भावुक कर दिया।

गुरगुल बहुत संवेदनशील और संभावनाओं से भरपूर है। उन्होंने शुरुआत इन पंक्तियों से की ‘एक उम्र लगा दी मैंने उससे ये पूछने के लिए, और कितना वक्त चाहिए तुम्हें सोचने के लिए’ पर फरमाइश एक के बाद एक आती रहीं और गुरगुल की कविताओं का दौर पौने तीन पर जाकर थमा। प्रज्ञा श्रीवास्तव ने जंगल के पेड़ और शहर के पेड़ की मन:स्थिति को लेकर बहुत खूबसूरत कटाक्ष करती हुई कविता सुनाई और एक शानदार हास्य रचना भी सुनाकर सबको खूब हंसाया।

शकुन्तला ने गुलाबी नगरी जयपुर की शान में खूबसूरत कविता सुनाई। विजय गौतम ने तीन शानदार ग़ज़ल पढ़ कर खूब दाद पाई। उनका एक शेर देखिए ‘तुमने हमसे बेहतर कपड़े पहने हैं, तुमको हमसे बेहतर देखा जाएगा!’
संगीता व्यास ने चांद,प्रेम और स्त्री को लेकर शानदार कविताएं सुनाई। धीरेन्द्र और अरुण ने अपने अंदाज में जीवन अनुभवों को कविता के रूप में पेश किया। तनेश अजीब की नज़्म और शायरी ने ज़बरदस्त समां बांधा। ‘उसकी आंखों के साथ मसअला ये है कि उन्हें आईना नसीब नहीं,उनको क्या पता कि खूबसूरत आंखें क्या होती हैं!”

निरुपमा चतुर्वेदी की मखमली आवाज में उनकी ग़ज़लों की खूबसूरती और बढ़ जाती है-‘एक अजब दर्द जगाती हैं तुम्हारी बातें”। सोनू ने चश्में को जीवन से जोड़कर कविता सुनाकर तालियां बटोरीं- “गुम हो जाते हैं आजकल या खिसक लेते हैं अपनी हद से।”डॉ बजरंग सोनी ने एक शहीद के परिवार की, गांव की पीड़ा उसके दादाजी के माध्यम से व्यक्त की और सभागार में सिसकियों की आवाज सुनाई दे रही थी।

कर्नल अमरदीप ने अपने आने वाले संग्रह से कुछ कविताएं साझा कीं-‘पगडंडी का सड़क होना’ और ‘ बंदूक से रिश्ता’ सुनाकर वाह वाही बटोरी।
विशाल गुप्ता ने पत्थर कविता के माध्यम से पत्थर होते इंसान को इंगित किया।

आखिरी और सबसे प्रतीक्षित पड़ाव… माया मृग का कविता पाठ । उन्होंने अपने पूर्वजों की धरोहर को हमारे नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का जो ज़िम्मा उठाया हुआ है, उसके तहत उन्होंने सदीक़ साहब के दो लोकप्रिय गीत गाकर सुनाए और सभी ने बहुत आनंद उठाया। उसके बाद उन्होंने अपने अद्भुत अंदाज़ में अपनी कविता सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।

इससे पुर्व शिवानी शर्मा ने मीना कुमारी को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए उनकी एक ग़ज़ल ‘चांद तन्हा है आस्मां तन्हा सुनाई और उसके बाद ‘दीवारें बहुत साफ हैं उस घर की’ कविता भी सुनाई। कविताओं के पश्चात मुंशी प्रेमचंद की कहानियों पर चर्चा हुई जिसमें डॉ बजरंग सोनी और सुनीता बिश्नोलिया ने ‘हीरा मोती’ कहानी पर चर्चा की। संवेदनाओं का चित्रण इस कहानी में जैसा किया गया है हम सभी परिचित हैं परंतु सुनीता बिश्नोलिया ने बैलों के संघर्ष को स्वाधीनता सेनानियों के संघर्ष से जोड़ कर जो व्याख्या की, जो दृश्य प्रस्तुत किया वो हमें भीतर तक मथ गया और एक नया दृष्टिकोण हमारे सामने आया। इस मायने में ये चर्चा बहुत ही सार्थक रही।

अजमेर पोएट्स कलेक्टिव ने निर्णय लिया कि भविष्य में क्लब इसी तरह की सार्थक चर्चा का आयोजन करता रहेगा। इसके अलावा अगली गोष्ठियों में हर बार साहित्य की अलग अलग विधाओं पर कार्यशाला की श्रृंखलाओं का आयोजन भी किया जाएगा । जिसकी सूचना पहले से दे दी जाएगी।

गोष्ठी के अंत में क्लब की संस्थापक शिवानी शर्मा नें सभी का आभार प्रकट किया । सभा का संचालन अर्चना जैन ने की ।

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