सियासत संवरती है आंदोलनों से और डरती भी उन्हीं से है

निरंजन परिहार

देश में आंदोलन है। आंदोलन में छात्र हैं। छात्र एग्जाम देते हैं। एग्जाम में पेपर लीक हो जाते हैं। सो, गुस्सा वाजिब है। सवाल नीट का एग्जाम देने वाले 22 लाख छात्रों की मेहनत का था। भविष्य सवालों में था और व्यवस्था कठघरे में। तो, सरकार ने तत्काल कठघरे से निकलने के लिए अच्छी व्यवस्था में फिर से एग्जाम करवा दिया। बात खत्म हो जानी थी। लेकिन फिर भी सरकार के खिलाफ आंदोलन। नई दिल्ली की सड़कों पर छात्र और युवा। आंखों में गुस्सा और दिलों में बेचैनी। वे जवाब मांग रहे थे और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी। महीने भर तक धरना, लेकिन अंत में प्रदर्शन के नाम पर अराजकता, तो टकराव वाजिब था। पुलिस आगे बढ़ी। लाठीचार्ज हुआ। वीडियो सामने आए। हालात बिगड़े। बहस तेज हो गई। देश भर में मुद्दा बना। तो, यहीं से राजनीति भी अपनी राह पर उतर आई, घुस गई आंदोलन में, और कहानी भी यहीं से बदल गई।

देश में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में आंदोलन जरूरी हैं। आंदोलन में सवाल जरूरी हैं और सवालों के जवाब भी जरूरी। मगर, जवाब मांगेगा कौन? छात्र जवाब मांगने लगे, तो राजनीति जाग गई। छात्र पीछे हो गए। नेता आने लगे। आंदोलन वही। चेहरे बदल गए। हर दल ने अवसर देखा। हर दल ने कैमरे देेखे। हर दल ने भीड़ देखी। यहीं से सियासत संवर गई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी धरने पर बैठे। सरकार पर सवाल उठाए। लोकतंत्र की बात की। युवाओं के भविष्य की चिंता जताई। सत्ता पक्ष ने पलटवार किया। कहा, विपक्ष अवसर तलाश रहा है। दर्द पर राजनीति हो रही है। विपक्ष का जवाब भी तैयार था। कहा, सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है। छात्रों की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती। राहुल गांधी बोले – सरकार संसद में बहस करे, हम धरना तोड़ देंगे। सरकार बोली – जी बहस कर लेंगे। सरकार मान गई, तो राहुल सन्न। उनको लगा कि तीर खाली चला गया, तो धरना तोड़ने की बात बदल कर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर पहुंच गए। पुलिस ने राहुल को उठाया और ले गई, फिर रात को छोड़ भी दिया।

उद्देश्य केवल नीट के एग्जाम था? लक्ष्य व्यवस्था में सुधार था। एग्जाम हो भी गया था। मगर, छात्रों के बहाने सरकार को घेरने का लक्ष्य बड़ा हो गया। आंदोलन कॉक्रोच जनता पार्टी का था। न जनाधारहीन और न ही संगठन, न ही कोई नामी चेहरा। लेकिन आंदोलन जारी। अभिजीत दीपके को कौन जानता था। सफलता संदिग्ध दिखी, तो सोनम वांगचुंग को आगे ले आए। वांगचुंग को अन्ना हजारे की फ्रेम में फिट करने को असफलता मिली, तो संसद पर मार्च की कोशिश हुई। पुलिस ने रोका, तो राजनीति को यहीं अपना स्पेस दिखा। राजनीति कभी मैदान खाली नहीं छोड़ती। जहां भी भीड़ होती है, राजनीति वहीं पहुंच जाती है। कांग्रेस आ गई। उत्तर प्रदेश में चुनाव सामने देख कर समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव भी आ गए। पंजाब में चुनाव हैं, तो आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी सामने आ गए। सत्ता में बेदखली से भन्नाए शिवसेना के वो उद्धव ठाकरे भी जंतर मंतर पहुंच गए, जिनके पिता बाल ठाकरे राजनीति के लिए नई दिल्ली कभी गए तक नहीं। सबको मजा आ गया। जहां गुस्सा होता है, वहां राजनीति भी रणनीति के साथ अपने अवसर खोज ही लेती है। यही लोकतंत्र की ताकत भी है, यही उसकी चुनौती भी और यही कमजोरी भी। लेकिन जहां गुड़ होता हैं, मक्खियां तो पहुंच ही जाती हैं।

असली बहस इसी मोड़ से शुरू होती है। क्या हर छात्र आंदोलन राजनीतिक रंग ले लेता है? क्या हर आंदोलन का राजनीतिक समर्थन गलत है? क्या हर विरोध प्रदर्शन कानून – व्यवस्था की चुनौती बन जाता है? जवाब आसान नहीं हैं। मगर लोकतंत्र में संवाद जरूरी है। संवाद ना हो तो, विरोध का अधिकार है। पर, अधिकार शांति बनाए रखने का भी है। कानून और व्यवस्था पर हमला करेंगे, तो रोकने की कोशिशें भी होंगी। लाठियां भी चलेंगी, सिर भी फटेंगे। लाठियां भीड़ देखती हैं, वे नहीं देखतीं कि सामने बूढ़ा है, या जवान है या कोई जवानी। पुलिस की जिम्मेदारी व्यवस्था बनाए रखना है। माना कि बल प्रयोग भी हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए। लेकिन हद में रहते, तो कुछ नहीं होता। संसद की तरफ बढोगे, तो बल प्रयोग भी होगा। यदि अनावश्यक बल प्रयोग हुआ है, तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि हिंसा हुई है, तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। छात्रों की पीड़ा वास्तविक है। उनकी मेहनत वास्तविक है। उनकी चिंता वास्तविक है। और छात्रों के साथ राजनीति का छल भी परम सत्य है। क्यों?

जरा समझिए कि राजनीति की भूमिका हर बार आखिर, संदेह के दायरे में क्यों रहती है। सियासत समर्थन दें। सत्ता से सवाल करे। लेकिन छात्रों की आवाज़ पर हावी न हो। सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। भरोसा बहाल करना होगा। पारदर्शिता दिखानी होगी। हर शिकायत का उत्तर देना होगा। लेकिन किसी भी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ से नहीं उसकी दिशा से मापी जाती है। मर्यादा से मापी जाती है, और उसके परिणाम से मापी जाती है। युवाओं को संघर्ष नहीं, समाधान चाहिए। छात्रों को टकराव नहीं, विश्वास चाहिए। आश्वासन नहीं, व्यवस्था चाहिए। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है। और यही सरकार, विपक्ष और संस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। विपक्ष सरकार को घेरता है। सरकार विपक्ष पर आरोप लगाती है। यह नया नहीं है। लेकिन छात्र? उनका भविष्य किसी प्रेस नेता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं बनता। नेता बयान दे रहे हैं। मगर, जब राजनीतिक बयान सुर्खियां बनने लगें, तब असली मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

अब, देश  तय करे कि यह आंदोलन राजनीतिक दलों की चुनावी बहस बने या शिक्षा सुधार की शुरुआत। आंदोलन की सफलता भीड़ से नहीं मापी जाती। उसके परिणाम से मापी जाती है। यदि परीक्षा प्रणाली मजबूत हुई, आंदोलन सफल है। यदि दोषियों को सजा मिली, आंदोलन सफल है। यदि भविष्य में पेपर लीक रुके, आंदोलन सफल है। लेकिन यदि अंत में केवल राजनीतिक भाषण बचे, और छात्र फिर उसी कतार में खड़े रह जाएं, तो हार किसकी होगी? सरकार की? विपक्ष की? नहीं। हार उस छात्र की हुई जिसने रतजगे करते हुए किताबें पढ़ीं, परीक्षा दी और नतीजा शून्य। आंदोलन दरअसल वहीं मर जाते हैं, जहां राजनीति घुस जाती हैं। इसलिए बहस का केंद्र नेता नहीं, दल भी नहीं, उद्देश्य होना चाहिए। बहस के केंद्र में होना चाहिए छात्रों का भविष्य। लेकिन बहारें फिर भी आएंगी की तर्ज पर राजनेता तो हर चुनाव में और हर आंदोलन में फिर आएंगे। क्योंकि राजनेता आंदोलन से निखरते हैं, मगर राजनीति तो आंदोलनों से डरती है और इसीलिए वह हर हाल में आंदोलनों में घुस ही जाती है, ताकि आंदोलन बेचारे लग सकें और उनका असर, बेअसर हो सके। आप भी यही मान रहे होंगे।

-निरंजन परिहार

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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