क्या दौर है ये
समझ से परे है
अनजान , अजनबी
सब रिश्ते हुए है
चाहते है बढ़ कर
हाथ थामना
लेकिन ज़ंजीरो से
जकड़े हुए है
लोभ सासों का इस
कदर है छाया
हम मतलबी ,ख़ुदगर्ज़
होने लगे है
संग खड़े रहते थे
जो अपने
संग उनके खड़े होने से
कदम डगमगाने लगे है
दुख दर्द बाटने से
कम होता है
इन बातों को हम
भूलने लगे है
साथ अपनो का
छूट रहा है
अंतिम विदाई भी
ना दे पा रहे है
चाह नहीं थी कभी
ऐसे दिनो की
प्रभु अब हम सच में
थकने लगे है
समेट लो अपनी इस माया को
हे प्रभु
हाथ जोड़ हम खड़े हुए है
अम्बिका हेड़ा