आजकल सब बेईमान हो गए है !

व्यंग्य
देश के दूर संचार मंत्री बुरा नही मान जाय इस वजह से यह बात मैं अभी तक उजागर करने से बचता रहा लेकिन अब मैं सोच रहा हूं कि यह बात सबको बता ही दूं जिससे पता लग जाय कि औरों की तरह पोस्ट ऑफिस वालें भी कोई ईमानदार प्राणी नही हैं. आखिर मैं भी इस बातको कब तक पचाता ?

शिव शंकर गोयल
घटना बहुत पुरानी हैं. सन 1963 की, लेकिन रह रहकर आज भी मेरे जेहन में उमडती घुमडती रहती है. पहले पहल रेलवें में मेरी नौकरी लगी थी और मैं गांधीधाम-कच्छ- में था. कुछ समय बाद मुझे अपने अजमेर स्थित घर पर माताजी को दो सौ रू. का मनीऑडर करना था. मैंने अपने मित्र से इस बाबत सलाह की और पहली तनख्वाह होने के कारण सौ-सौ रू. के दो नोट भिजवाने की इच्छा जाहिर की. मित्र बोला अच्छा तो यही होगा कि लिफाफें में चिटठी के साथ ही भिजवादें क्योंकि आजकल इन पोस्ट ऑफिसवालों का कोई भरोसा नही, जाने रू. पहुंचाये या नही ? कही रास्तें में ही रखले.
कुछ दिन मैं उधेडबुन में रहा फिर एक रोज हिम्मत करके पोस्ट ऑफिस पहुंचा और दो सौ रू. का मनीऑडर करवा दिया. पोस्ट ऑफिस में मैंने मनीऑर्डर चार्जेज के अलावा सौ सौ रू. के दो नए नोट उनको दिए. एम.ओ भेजकर मैं कुछ दिनों के लिए निश्चिंत होगया.
थोडे दिनों बाद घर से चिटठी आई कि तेरे भेजे दो सौ रू. मिल गए हैं. बात आई-गई होगई.
कुछ दिनों बाद मेरा घर -अजमेर- जाना हुआ तो सबसे पहले मैंने मनीऑडर के रू. की ही बातकी और पूछा कि सौ सौ रू. के दो नए नोट थे.
‘… नए ? डाकिया तो दस दसके बीस पुराने नोट दे गया था.’ माताजी बोली.
‘… मैंने तो सौ सौ के दो नए नोट पोस्ट आफिसवालों को दिए थे’ मैं बोला.
‘… कोई नए नही थे. पुराने दस दस के नोट थे.’ माताजी ने दोहराया.
‘… आजकल सब बेईमान होगए है !’ अनायास ही मेरें मुंह से निकला.

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