‘मासिक धर्म स्वच्छता दिवस’ पर राष्ट्रीय संस्था पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया का कहना है कि कोविड -19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान किशोरियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए निर्धारित बजट एक सराहनीय कदम है।

इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए सुश्री दिव्या संथानम (वरिष्ठ राज्य कार्यक्रम प्रबंधक, पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया, राजस्थान) ने कहा, “राजस्थान सरकार ने निःशुल्क दवा योजना के लिए लगभग 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन किया है, जिसमें सेनेटरी पैड के निःशुल्क वितरण के साथ साथ सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों द्वारा वितरण का विस्तार एवं के जागरूकता अभियान शामिल हैं। इस सब प्रयासों के माध्यम से माहवारी स्वच्छता के बारे में जागरूकता फैलाने में मदद मिलेगी। ”
डॉ. अमिता कश्यप, एमडी – पीसीएम, सीनियर प्रोफेसर, एसएमएस मेडिकल कॉलेज बताती हैं “हमें हर स्तर पर सकारात्मक प्रयास करने की आवश्यकता है। एनएफएचएस -4 (2015-16) के अनुसार भारत में लगभग 50 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं अभी भी महावारी के स्वच्छ तरीकों का उपयोग नहीं करती हैं। लड़कियों को अक्सर किशोरावस्था में होने वाले बदलाव और मासिक धर्म के बारे में जानकारी नहीं दी जाती । माहवारी शुरू होने पर कई किशोरियों को स्कूल छोड़ना पड़ता हैं। इस विषय पर खुल कर चर्चा करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की स्वच्छता उत्पादों की उपलब्धता क्योंकि आज भी हमारे समाज में माहवारी जैसे संवेदनशील विषयों से कई सामाजिक प्रतिबंद, धारणाएं, अंधविश्वास और भेदभावपूर्ण प्रथाएं जुड़ी हुई हैं। उम्मीद है कि राज्य सरकार के साथ -साथ समाज सेवी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता कार्यक्रमों से सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन होंगे और समुदाय मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन की अनदेखी के दुष्परिणामों को समझेगा।”
इस साल फरवरी में माननीय मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा पेश किए गए राजस्थान बजट (2021-22) में महिलाओं और लड़कियों को, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, निःशुल्क सैनिटरी नैपकिन देने की घोषणा की गयी है। राज्य में माहवारी प्रबंधन से सम्बंधित उत्पादों की पहुंच और उपलब्धता में सुधार के लिए किये गए इस कदम का स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्वागत किया है।
अप्रैल-मई 2020 में पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार में किए गए एक अध्ययन से यह भी पता चला कि अध्ययन में शामिल 50 प्रतिशत से अधिक युवा लड़कियों की सैनिटरी पैड तक पहुँच नहीं थी। स्वच्छता उत्पादों का महंगा होना, फार्मेसियों से दूरी और स्वास्थ्य केंद्रों पर इन उत्पादों का उपलब्ध न होना इसके कारण रहे।
माहवारी से जुड़ी आदतें किशोरियों के जीवन पर गहरा असर डालती हैं. ये अत्यंत आवश्यक है की पहली माहवारी होने से भी पहले किशोरियों को सही जानकारी माता पिता एवं शिक्षकों से मिले, ताकि शुरुआत से ही वो इस नए बदलाव का सामना बिना भय और झिझक के कर सकें .
सरकारी स्कूलों का महामारी के कारण बंद पड़ जाना लड़कियों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है क्योंकि मुफ्त सेनेटरी नैपकिन का वितरण और मिलने वाली जानकारी का संचार बंद हो गया है और साथ ही उनकी शिक्षा पर भी असर पड़ा है. इंटरनेट व अन्य डिजिटल प्रौद्योगिकियों के उपयोग में आर्थिक और सामाजिक असमानता के कारण हर लड़की को ऑनलाइन क्लासेज की सुविधा उपलब्ध नहीं है और इस कारण उनकी पढ़ाई में भी रूकावट आयी है.
सरकारी स्कूलों का महामारी के कारण बंद पड़ जाना लड़कियों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है क्योंकि मुफ्त सेनेटरी नैपकिन का वितरण और माहवारी से जुडी जानकारी का संचार बंद हो गया है .
एनएफएचएस -4 (2015-16) के अनुसार वह महिलाएं जो बारह या उससे अधिक साल तक पढ़ाई कर चुकी हैं, उनमें माहवारी से जुड़े स्वच्छ साधनों के इस्तेमाल की चार गुना अधिक संभावना पायी गयी है उन महिलाओं की अपेक्षा जो कभी स्कूल नहीं गयी.
दिव्या ने इस तथ्य की सराहना की कि राज्य में माहवारी स्वच्छता योजना से 15 से 45 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 1.2 करोड़ महिलाओं को लाभ होगा। “इस तरह की पहल दर्शाती है कि राज्य सरकार माहवारी स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों और जरूरतों को पहचानने के प्रति संवेदनशील है। ये कदम महिलाओं और लड़कियों को माहवारी स्वच्छता संबंधी परेशानियों जैसे कि फंगल, मूत्र पथ और प्रजनन पथ के संक्रमण से बचाने में सफल होंगे। सभी युवा लड़कियों तक उनके माहवारी प्रबंधन के लिए सही जानकारी और संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। हम भी सभी हितधारकों के साथ मिलकर ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेंगे.”