
सरल शब्दों में कहूँ तो परिवार-परवेश से मिली समृद्धि बाँटने का मन चारों ओर खड़ी पाषाण दीवारों से टकरा कर चूर चूर हो जाता है.. प्रेम, करुणा, दया सरीखे मानवीय-मूल्य आत्महंता हिंसा के सापेक्ष भरभराकर ढह जाते है.. पीड़ा, दर्द, हँसी, मुस्कान के चेहरे आडम्बरों के शोर में विकृत हो जाते हैं…सच के पास पहुंचने की हर कोशिश रास्ते को बीच मे छोड़ अपने लिए कुछ ढूंढने लगती है..।
स्थूल उदाहरण जैसे फेसबुक को किसी वैचारिक पोस्ट पर सौ लोगो के समूह में से दस का वहाँ पहुंचना….दस में से दो उसे पसंद करना..दो का औपचारिक रिश्ते निभाना ..और शेष छः का उसे नापसंद करते हुए नाराज हो जाना….दूर हो जाना ..कभी कभी हमेशा के लिए खो जाना..।
हालॉकि ठीक उसी समय दूसरा विचार सामने आता है ..दुनिया सदा से ऐसी ही रही है (बल्कि अब तो पहले से बेहतर है.)। अपने समय को देखने और आईना दिखाने वाले कभी भी प्रिय नहीं रहे..। नचिकेता से लेकर प्रह्लाद तक..विदुर से चाणक्य तक.. बुद्ध से ईसा तक.. खुसरो से कबीर तक..गालिब से धूमिल तक.. ।
यहाँ स्वम को उनके समकक्ष या साथ बैठाने का मंतव्य बिल्कुल नहीं है….इस उदाहरण में भीड़ और नीड का फर्क देखना है..। भीड़ हमेशा ही स्वार्थ, सम्मोहन और सिंहासन के अनुकूल रही है..नीड नियति के हाथों में हाथ के आकार की एक छोटी-बड़ी मशाल पकड़ा देती है। भीड़ उतना ही देखती है जितना उसे दिखाया जाता है…उसे अंधेरों की आदत डाली जाती है.. उजालों से दूर रखा जाता है ..। नीड उजालों को सहेजती है.. अपनी नजर से देखती है..नए रास्ते खोजती है..।
स्वम को नीड का प्रतिनिधि मानने पर डर, अविश्वास, एकान्त, सब बेमानी लगने लगता है। ..बल्कि सच तो ये है कि भय मुक्त होकर विचार विचरण करने लगते हैं…क्योंकि वे जानते हैं कि हिंसक विचार भी हिंसक पशु की मानिंद केवल उजाले से ही डरता है…।सम्भवतः यह मेरा या मेरी जैसी कलमों का अतिरेक या अज्ञान हो…किन्तु अपने होने को बनाये रखने के लिए इस विश्वास का होना जरूरी है कि आप अकेले नहीं हैं..। अंधेरे को नकारने वालो के बीच उजाले के साथ खड़े रहना, पाने और खोने की गणित से परे होता है..। वह कभी निरर्थक नहीं होता..वह कभी खाली नहीं होता..।
मुझे पता है मुझ सरीखे जुगुनू अपनी टिमटिमाहट से कोई सूरज नहीं उगा सकते..लेकिन अंधेरों से लड़ने का सुकून लेकर जी सकते हैं। अगर नियति ने उजाले के निमित्त कलम थमाई है तो हिंसक अंधेरे के बीच जाना ही होगा…लड़ना ही होगा..मिटना ही होगा ..।
फिराक गोरखपुरी का ये शेर याद आता है-
सुकुते-शाम मिटाओ बहुत अंधेरा है
सुख़न की शमा जलाओ बहुत अंधेरा है
ये रात वो है सूझे जहाँ हाथ को ना हाथ
ख़यालों दूर न जाओ बहुत अंधेरा है .
अर्थ-सुकुते शाम-उदास शाम, सुख़न- साहित्य
*रास बिहारी गौड़*