*प्रभु इच्छा को सर्वोपरि माना ही शाश्वत आनंद की प्राप्ति*
– सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज
केकड़ी14 फरवरी 2022 (पवन राठी)शाश्वत आनंद की निरोल अवस्था को निरंतर कायम रखने के लिए प्रभु इच्छा को सर्वोपरि माना होगा तभी भक्ति मार्ग पर चलते हुए हैं आनंद की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है यह मनोभाव सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने दिनांक 13 फरवरी 2022 को महाराष्ट्र के 55 वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के समापन पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए
टाकावास ब्रांच के मुखी कालूराम जी निरंकारी ने बताया कि
सतगुरु माता जी के आशीर्वाद के साथ ही इस तीन दिवसीय संत समागम का सफलतापूर्वक समापन हुआ समागम का सीधा प्रसारण मुंबई के चेंबूर स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन से मिशन की वेबसाइट एवं साधना टीवी चैनल पर किया गया जिस का आनंद विश्व भर के लाखों श्रद्धालु भक्तों ने प्राप्त किया!
सतगुरु माता जी ने आनंद की अवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब हम इस निरंकार प्रभु परमात्मा से जुड़ जाते हैं तब भक्ति का एक ऐसा रंग हम पर चढ़ता है कि सदैव ही आनंद की अनुभूति प्राप्त होती है इस आनंद में भक्त इस प्रकार से तल्लीन रहता है कि फिर किसी के बुरे शब्दों या व्यवहार का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वह भक्ति द्वारा आनंद की अवस्था को प्राप्त कर चुका होता है
एक रस रहने की अवस्था जीवन में तभी संभव होती है जब हम इस निरंकार से पूर्णता जुड़ जाते हैं जीवन की परिस्थिति का वर्णन करते हुए सतगुरु माता जी ने कहा कि दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोई अर्थ दुख की स्थिति में तो सभी ईश्वर का स्मरण करते हैं किंतु सुख में शुकराने का भाव प्रकट करना भूल जाते हैं सुख एवं दुख तो जीवन के दो महत्वपूर्ण पहलू है जिसका जीवन में आना निश्चित है किंतु भक्त जब भक्ति के रंग में होता है तब हर पल आनंद का अनुभव करते हुए इस दातार की रजा में रहकर एक सकारात्मक दृष्टिकोण को अपना लेता है फिर दुख की स्थिति आने पर भी वह दुखी नहीं होता
महात्मा गौतम बुद्ध जी के जीवन में घटित घटना का वर्णन करते हुए सतगुरु माता जी ने कहा कि एक व्यक्ति जब उनके ऊपर थूक कर चला गया तो उन्होंने अपने शिष्यों को यह भी कहा कि हमारा इसके साथ कोई पुराना खाता होगा उसने अपना काम किया और शायद यह खाता यहां पर समाप्त हो गया उस व्यक्ति का ऐसा दुर्व्यवहार भी उनके आनंद एवं मन की शांति को अस्थिर नहीं कर पाया तो कहने का भाव केवल यही कि हमें भी स्वयं को निरंकार प्रभु के साथ जोड़कर आत्मसात की स्थिति में रहते हुए उसका सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाना है इसके लिए दृढ़ विश्वासी संतों का संग एवं सेवा सिमरन सत्संग का आधार लेते हुए प्रतिपल मन से इस निरंकार प्रभु के साथ जुड़ जाना ही भक्ति है जिससे कि आनंद की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है
विश्वास ,भक्ति, आनंद तीनों को जीवन में समान रूप से किया जा सकता है यह नहीं कि पहले भक्ति में परिपक्व होना है फिर विश्वास में और तब जाकर आनंद की अवस्था प्राप्त होगी भक्तों को तो अपने जीवन में इन तीनों को समान रूप से लेकर चलना होगा यह किसी प्रकार का कोई खेल नहीं कि पहला चरण पार किया तो फिर दूसरा चरण यह तो जीवन का एक उद्देश्य है जिससे इस वर्ग के प्रति पूर्ण समर्पित होकर ही भक्ति की जा सकती है और तभी सही मायनों में आनंद की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है
*बहुभाषी कवि सम्मेलन*
मीडिया सहायक सुरेश चंद कहार ने बताया कि समागम के तीसरे दिन का मुख्य आकर्षण एक बहुभाषी कवि सम्मेलन रहा जिसका शीर्षक – *श्रद्धा भक्ति विश्वास रहे मन में आनंद का वास रहे* था इस विषय पर मराठी ,हिंदी ,पंजाबी ,कोकणी, अहिराणी, भोजपुरी एवं गुजराती आदि भाषाओं में कुल 18 कवियों ने कविताओं के माध्यम द्वारा अपनी भावनाओं को व्यक्त किया इसके अतिरिक्त समागम के तीनों दिन विभिन्न भाषाओं में वक्ताओं द्वारा अपने विचारों का व्याख्यान गीत ,भजन ,कविता आदि विधाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया जिस में अनेकता में एकता का सुंदर दृश्य एवं वसुदेव कुटुंबकम की अनूठी छवि दर्शाई गई संत समागम के समापन पर सतगुरु माता जी के दिव्य प्रवचन ओं द्वारा सभी श्रद्धालुओं ने विश्वास भक्ति आनंद की अनुभूति प्राप्त की साथ ही स्वयं को इस निरंकार से हर पल आत्मसात पाया जो इस संत समागम का मूल उद्देश्य था।