
कहने का तात्पर्य है कि धर्म की अवधारणा अजब विरोधाभासी द्वंद जन्म देती है। धर्म- उजाला है या अंधेरा है? ज्ञान है या अज्ञान है? विश्वाश है या अंधविश्वास है ? राह है या विचलन है? प्रेम है या घृणा है? वर्चस्य है या समर्पण ..? समग्र है या शून्य है ? भय है या निर्भयता..? पाना है या खोना ..? युद्ध है या शांति ..? आदि आदि.. । ऐसा लगता है कि जीवन विरोधाभासों को एक साथ जीने का नाम ही धर्म है, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र मंथन में अमृत और विष दोनों ही सागर की कोख से ही निकलते हैं। अर्थात कि धर्म को समझने का एक बड़ा अर्थ है कि उसका अमृत बांटकर उसके विष को पी जाना है।
ऐसा लगता मानवीय सभ्यता की आचार संहिता सिखाने के लिए अलग अलग भू भाग में धर्म की अवधारण ने जन्म लिया होगा ..कलान्तर में उसमें सुधार अथवा विकार होने पर नए नए धर्मो का उदय होता रहा। उसके लिए तात्कालिक प्रतीक, आस्था केंद्र, नायक या पुस्तकें रची गईं। विकास के स्वभाविक क्रम में मानवीय स्वार्थ और स्वभाव में परिवर्तन आया होगा, धर्म को लेकर हर स्तर पर वर्ग संघर्ष ने जन्म लिया होगा..परिणाम युद्ध, घृणा, वैमनस्य, सरीखे विकार पैदा हो गए होंगे, जो आज तक किसी ना किसी रूप में जिंदा हैं। दूसरा पक्ष यह भी है अनेक मनीषी, विद्धान, शिक्षक, त्यागी, मूल्य, सरोकार, सभ्यता- समय ,भी इसी धर्म के कारण ही सम्भव हुए हैं।
बहरहाल, लगता है कि मानव की विकास यात्रा में धर्म उसके साथ उसी तरह नत्थी हो गया है जैसे कि व्यक्ति से उसके जन्म का स्थान या स्थिति जुड़ जाती है। आसान शब्दों में कहें तो धर्म डी.एन.ए. बनकर हर समुदाय की एक अलग पहचान गढ़ता रहा है। चूंकि सारा संकट पहचान के अर्थ को नहीं समझ पाना या उसे संकुचित कर देने से हो रहा है, अतः हम धर्म के नाम पर अंधेरा, अज्ञान, अंधविश्वास सरीखे नकार ही इकठ्ठे कर रहे हैं उदाहरणार्थ प्रारम्भिक स्नेह, शिक्षा, संस्कार माँ देती है तो अगर हम धर्म को मनुष्य की माँ मान लें तो भला दूसरी किसी माँ के प्रति सहज सम्मान पैदा होगा। किन्तु यहाँ भी वही मानवीय विकार काम करता है अपनी माँ के कशीदे पढ़ते हुए दूसरे के प्रति द्वेष दिखाने के लिए गालियों में माँ पर प्रहार करते हैं। ठीक वैसे ही युद्धों, दंगों, बलवों में किसी अराजक कृत्य का क्रोध उसके समूचे धर्म पर निकलते हैं। तब हम ना हम ना धर्म को समझ रहे होते हैं और ना ही धर्म मे निहित उसके अमृत भाव को ग्रहण कर रहे होते हैं।
यूँ यह विवेचना बहुत आगे तक जा सकती है लेकिन संक्षिप्त में कहा जा सकता है कि धर्म आचरण में सकारात्मक भावों को सहेजने की बेहद निजी अवधारणा है जो निज से समूह का निर्माण करती है। धर्म जब प्रचार, प्रदर्शन या वर्चस्य की कामना करता है तो वह निज को सर्वस्य मान शेष का विध्वंस रचता है ।
रास बिहारी गौड़