नेत्रहीन स्मृति को कैसे संग्रहित करते हैं, आम तौर पर यह प्रश्न लोगों के जेहन में उठता है। इस बारे में चैट जीपीटी से सवाल किया गया तो उसका कहना था कि यह मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान और दर्शन, तीनों से जुड़ा हुआ है। नेत्रहीन व्यक्ति के मस्तिष्क में भी चित्र बनते हैं, लेकिन उनका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि वह जन्म से नेत्रहीन है या बाद में दृष्टि खोई है। जो व्यक्ति जन्म से ही कभी देख नहीं पाया, उसके मस्तिष्क में दृश्य चित्र वैसे नहीं बनते जैसे दृष्टिवान लोगों के मन में बनते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप लाल गुलाब सोचते हैं तो आपके मन में उसका रंग और आकार उभर सकता है। जन्मजात नेत्रहीन व्यक्ति के लिए गुलाब की स्मृति उसकी सुगंध, स्पर्श, आकार, कांटों और उससे जुड़े अनुभवों के रूप में होती है। अर्थात् उसकी मानसिक दुनिया ध्वनि, स्पर्श, गंध, स्वाद और स्थानिक अनुभवों पर आधारित होती है।
यदि कोई व्यक्ति जीवन के किसी चरण में देखने के बाद नेत्रहीन हुआ है, तो उसके मस्तिष्क में पहले से संचित दृश्य स्मृतियां बनी रहती हैं। वह वर्षों बाद भी अपने घर, परिवार या प्राकृतिक दृश्यों की कल्पना कर सकता है। कई लोग सपनों में भी चित्र देखते रहते हैं। आधुनिक न्यूरो साइंस के अनुसार स्मृति किसी फोटो एलबम की तरह नहीं रखी जाती। मस्तिष्क विभिन्न अनुभवों को न्यूरॉन्स के नेटवर्क में संग्रहित करता है। नेत्रहीन व्यक्ति भी स्मृतियों को उसी प्रकार संग्रहीत करता है, लेकिन उनमें दृश्य सूचनाओं के स्थान पर अन्य इंद्रियों से प्राप्त सूचनाएं अधिक होती हैं। उदाहरण के लिए, वह किसी व्यक्ति को उसके कदमों की आहट, आवाज, बोलने के ढंग, हाथ मिलाने के स्पर्श, या किसी विशेष सुगंध से पहचान सकता है।
अनुसंधानों से पता चला है कि जन्मजात नेत्रहीनों के मस्तिष्क का दृश्य प्रांतस्था जो सामान्यतः देखने के काम आती है, निष्क्रिय नहीं रहती। वह ब्रेल पढ़ने, ध्वनियों की पहचान करने और स्थानिक जानकारी को समझने में सहायता करने लगती है। यानी मस्तिष्क स्वयं को पुनर्गठित कर लेता है।
यह प्रश्न हमें यह भी सोचने पर विवश करता है कि चित्र वास्तव में क्या है। क्या चित्र केवल आंखों से देखा गया दृश्य है, या अनुभवों का कोई भी आंतरिक रूप? यदि दूसरा उत्तर सही है, तो नेत्रहीन व्यक्ति भी अपने मन में संसार की उतनी ही समृद्ध छवियां रचता है, बस उनका माध्यम दृष्टि नहीं, बल्कि स्पर्श, ध्वनि और अनुभूति होती है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि नेत्रहीन व्यक्ति के मन में चित्र नहीं बनते, ऐसा नहीं है, बल्कि उसके चित्र हमारी दृश्य कल्पनाओं से भिन्न प्रकार के होते हैं।