*कैसे दिन आए हैं*

नटवर विद्यार्थी
रहते थे कभी
परस्पर सहभागी बनकर
आज रहते हैं
एक-दूसरे से तनकर
मिलना-जुलना सब बन्द है
वातावरण में एक अज़ीब सी गंध है
ना हँसी है ना कहकहे हैं
जीने के लिए बस जी रहे हैं
एक छत के नीचे रहकर भी
अनजान है
भयभीत सा हर इंसान है
पहले वाला प्रेम-भाव भी नहीं है
पता नहीं किसकी नज़र लग गई है
अपनों के बीच रहकर भी पराए हैं
उफ़… ये कैसे दिन आए हैं !
– नटवर पारीक

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