याद आती है जब मुझे घर-परिवार की
तो चला जाया करता हूं किसी एकांत स्थान पर
जहां मेरे सिवा होता नहीं और दूसरा कोई
सिर्फ मैं और मेरी तन्हाईयां होती है ।
फिर शुरू हो जाता है, सोचने का सिलसिला
वे गुज़रे हुए सुनहरे पल
मुन्ने की जिज्ञासा भरी बातों का वह क्षण
मां का प्यार दुलार, ममता भरा स्पर्श
बार-बार चुभाती है, मेरी यह सोच ।
घूमता रहता है मेरे इर्द-गिर्द तुम्हारी यादें
जब मैं यादों के घेरों में घिर जाता हूं
तो विध्न डालना आरम्भ कर देते हैं
कर्तव्य की राहों में मेरी यह सोच ।
तब अकस्मात याद आ जाता है
कर्तव्य पालन की वे सारी बातें
देश का सिपाही बन जाने पर
जो मां ने समझाते हुए मुझसे कहीं थीं ।
बेटा निस्वार्थ लग जाना देश की सेवा में
क्योंकि अब तुम मेरे पुत्र नहीं रहें
तुम तो देश के सपूत बन गये हो
जिसका पुत्र देश का होता है
उसकी मां तो सारे संसार की होती है।
मां की हौसले भरी वे सारी बातें
लगा देती है बेड़ियां मेरी उस सोच पर
फिर अतीत से वर्तमान में आ जाता हूं
और लौट आता हूं अपने रणस्थल पर।
यदि लड़ते हुए देश पर शहीद हो जाऊं मैं
तो प्यार से श्रद्धापुष्प चढ़ा देना मुझे तुम
एक उपकार और भी कर देना मुन्ने की मां
देश की सेवा में मेरे पुत्र को लगा देना तुम
देश की सेवा में मेरे पुत्र को लगा देना तुम।
गोपाल नेवार, ‘गणेश’सलुवा, प.बं 9832170390