ऐसा भी होता है…

ज़िंदगी… कितनी अजीब चीज़ है न! कभी मुस्कान के रंग भर देती है तो कभी आँसुओं के सागर में छोड़ जाती है। ऐसा भी होता है — जब एक इंसान दुनिया के बीच होकर भी बिल्कुल अकेला रह जाता है, और फिर धीरे-धीरे दुनिया से ही विदा हो जाता है…
मेरी एक परिचिता थीं — बहुत ही कोमल हृदय और संवेदनशील आत्मा। दो साल पहले उनकी इकलौती बेटी इस दुनिया को छोड़कर चली गई थी। वही बेटी उनकी ज़िंदगी का एकमात्र सहारा थी। पति से पहले ही अलग रह रहीं थीं। घर में न कोई बेटा, न कोई साथ निभाने वाला परिवार। बस अकेलापन था — जो धीरे-धीरे उनके जीवन की परछाई बन गया।
कुछ महीने पहले उनका एक्सीडेंट हुआ। तबीयत लगातार गिरती चली गई। मोहल्ले वालों ने, भाभी ने, रिश्तेदारों ने कोशिश की — लेकिन किसी की भी कोशिश उस अकेलेपन को नहीं भर सकी जो भीतर गहराई तक जड़ जमा चुका था। इंसान चाहे कितना भी बड़ा दिल रखे, एक समय के बाद थक जाता है — संभालते-संभालते।
उनके घर की हालत बिगड़ने लगी थी। बीमारी के चलते वह खुद की देखभाल नहीं कर पा रहीं थीं। धीरे-धीरे घर सड़ांध मारने लगा, और आखिर मकान मालिक ने साफ कह दिया — “पहली तारीख तक मकान खाली कर दीजिए।”
वह बेबस थीं…
कोई सहारा नहीं, कोई घर नहीं। शायद भगवान भी उनकी यह पीड़ा देख रहे थे।
उन्होंने कुछ कपड़े और ज़रूरी सामान उठाया, और होटल में शिफ्ट हो गईं — सोचकर कि चार-पाँच दिन आराम कर लूँ, फिर कोई घर देख लूँगी। लेकिन किसे मालूम था कि यह उनका आख़िरी ठिकाना होगा।
वह ज्योतिषी थीं — और शायद उन्हें पहले से अहसास था कि उनका सफर अब पूरा होने वाला है। पिछले कुछ दिनों से वह अपने परिचितों को बार-बार फोन कर रही थीं —
“आ जाओ मुझसे मिलने, वरना मैं उड़ जाऊँगी…”
यह वाक्य अब भी कानों में गूंजता है — जैसे कोई आत्मा अपनी विदाई का पूर्व संकेत दे रही हो।
और फिर सचमुच, वह उड़ गईं…
इस बार सचमुच भगवान ने उन्हें अपने पास बुला लिया।
शायद भगवान ने देखा होगा कि अब इस धरती पर उनके लिए कोई जगह नहीं बची, इसलिए अपने आँगन में स्थान दे दिया।
कभी-कभी सोचती हूँ, ज़िंदगी का यह पक्ष कितना क्रूर होता है —
जहाँ एक औरत जो किसी की बेटी, किसी की माँ, किसी की पत्नी रही —
आख़िर में बस “एक नाम” बनकर रह जाती है,
जिसे याद करने वाले कुछ गिने-चुने लोग भी धीरे-धीरे चुप हो जाते हैं।
परंतु उसकी आत्मा… शायद अब कहीं सुकून में होगी।
वह अब उस बेटी से मिल चुकी होगी जिसे वह रोज़ तस्वीर में निहारती थी।
अब न कोई मकान मालिक उसे घर से निकाल सकता है,
न कोई उसे “अकेली” कह सकता है।
वह अब सचमुच अपने घर में है
भगवान के घर में।
क्योंकि…
ऐसा भी होता है।
डॉ. मधु खंडेलवाल
9462131405

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