–श्रीमती संतोष शर्मा
स्वतंत्र पत्रकार साकेत नगर
ढाई अक्षर के प्रेम शब्द में वह शक्ति है जिससे दो आत्माओं का पवित्र मिलन होता है। जो प्यार करने वाले दो दिलों को हमेशा हमेशा के लिए एक दूसरे से बांध देता है। यह प्रेम दो आत्माओं में अपनापन होने पर स्वतः ही पैदा होता है।
प्रेम को स्त्री और पुरुष दोनों अलग-अलग अंदाज से लेते हैं। एक व्यक्ति को इच्छित पत्नी एवं औरत को इच्छित पति मिल जाए तो उनका जीवन सफल हो जाता है अन्यथा वे एक दूसरे को मात्र सामाजिक समझौता समझ कर जीते रहते हैं। स्त्री प्यार को साफ समझती है प्यार उसके लिए भक्ति समान है। वह किसी की परवाह किए बिना अपने आप को समर्पित करती है और बिना किसी शर्त की यह भावना ही स्त्री के प्रेम को विश्वास की ठोस बुनियाद देती है। जिसके दम पर उसका प्यार अविचलित रहता है लेकिन दूसरी तरफ पुरुष के साथ ऐसा नहीं होता। वह प्यार को जिंदगी का एक हिस्सा मानता है जबकि स्त्री के लिए प्यार जिंदगी का आधार होता है। पुरुष जब किसी स्त्री से प्यार करता है तो वह उसके बदले में प्यार पाना चाहता है और कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं भी रखता है। पुरुष में स्त्री के समान समर्पण का अभाव होता है। इसके विपरीत प्रेम करने वाली स्त्री स्वयं को पूरी तरह भुला देती है। प्यार के खातिर वह अपनी आकांक्षाओं को भी त्याग देती है, अपने व्यक्तित्व को भुला देती है तथा प्रेम ही उसके लिए पवित्र धर्म बन जाता है जिसके खातिर वह अन्य सभी रिश्ते नातो को भूल जाती है।
स्त्री एवं पुरुष के लिए प्यार शब्द का फर्क अलग-अलग क्यों है? इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि स्त्री भावना प्रधान होती है जबकि पुरुष अहंकारी होता है। स्त्री प्यार में बह जाती है। स्त्री पुरुष में संबंध चाहे भाई बहन का हो या पति-पत्नी या देवर भाभी का, पुरुष सदैव अहंकार रखता है उसी के कारण वह समर्पित होने से रुक जाता है। एक स्त्री पुरुष की भावना को अच्छी तरह से समझती है जबकि पुरुष स्त्री की भावना की परवाह किए बिना अपने मन की करता है।
पुरुषों में उबाऊ प्रवृत्ति पाई जाती है चाहे घर में बात समझने की हो चाहे सुनने की हो अथवा चाहे स्त्री के साथ रहने की हो। पुरुष बहुत जल्दी ही ऊब जाता है। प्यार में पहले जो स्त्री उसे अच्छी लगती थी, ऊब जाने पर वह स्त्री में खामियां निकलने लगता है तथा दूसरी स्त्री से उसके तुलना करने लगता है जबकि एक स्त्री किसी पुरुष से प्यार करती है तो वह उसकी सारी खामियां नजरअंदाज कर देती है और उसकी गलतियों को सहन करते हुए अपने आप को परिपक्व बनाती है पर किसी दूसरे से आस नहीं बांधती।
कहा भी गया है कि वीणा के तारों को इतना भी मत कसो कि वह टूट जाए और इतना ढीला भी मत छोड़ो कि उनसे सूर ही ना निकले। प्रेम में भी यही बात बैठती है। किसी से बहुत ज्यादा किया गया प्रेम एक दिन टूट जाता है। पुरुषों में भी यही स्थिति है वह कभी प्यार नहीं करता पर उसमें निरंतरता की कमी होती है। प्यार को जिस रूप में स्त्री लेती है, पुरुष उतनी गहराई से नहीं लेता जबकि प्यार दोनों से समान अपेक्षाएं करता है। प्यार में भावनात्मक समर्पण की जरूरत है।