क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक शैली को लेकर बहस तेज

भाजयुमो की नई प्रदेश कार्यकारिणी पर उठे सवाल
अशोक लोढ़ा

जयपुर। राजस्थान भाजपा युवा मोर्चा की नई 63 सदस्यीय प्रदेश कार्यकारिणी घोषित होते ही संगठन और राजनीतिक हलकों में क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और कार्यकर्ता उपेक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। प्रदेशाध्यक्ष शंकर गोरा द्वारा घोषित इस टीम में प्रदेश उपाध्यक्ष, महामंत्री, मंत्री, मीडिया, आईटी और सोशल मीडिया सहित विभिन्न दायित्व सौंपे गए हैं। आगामी निकाय और पंचायत चुनावों को देखते हुए इसे भाजपा के युवा संगठन की महत्वपूर्ण चुनावी टीम माना जा रहा है।

कार्यकारिणी सूची के अनुसार जयपुर, सीकर, अजमेर, जोधपुर, पाली, कोटा, करौली, नागौर, चूरू, बालोतरा, श्रीगंगानगर, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा, टोंक, धौलपुर, अलवर, भरतपुर, बीकानेर, भीलवाड़ा, सिरोही, हनुमानगढ़, सवाई माधोपुर, उदयपुर और झुंझुनूं सहित कई जिलों एवं संगठनात्मक इकाइयों को प्रतिनिधित्व मिला है।
वहीं जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर, बूंदी, बारां, झालावाड़, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, राजसमंद और दौसा जैसे जिलों का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व सूची में दिखाई नहीं देने को लेकर संगठनात्मक और राजनीतिक हलकों में चर्चा बनी हुई है। विशेष रूप से झालावाड़–बारां क्षेत्र के कुछ कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर क्षेत्रीय संतुलन को लेकर सवाल उठाए हैं।
सामाजिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से सूची में राजपूत, गुर्जर, ब्राह्मण, जाट, मीणा, यादव, जैन और विभिन्न ओबीसी समुदायों की उपस्थिति दिखाई देती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार राजपूत और ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत अधिक नजर आता है। वहीं सार्वजनिक नामों और उपनामों के आधार पर देखने पर कायस्थ, सिंधी तथा पंजाबी/सिख समाज का कोई स्पष्ट प्रतिनिधित्व सूची में दिखाई नहीं देता। हालांकि भाजपा ने आधिकारिक रूप से कोई जातीय या सामाजिक वर्गीकरण जारी नहीं किया है, इसलिए यह विश्लेषण केवल सार्वजनिक नामों और सामाजिक पहचान के सामान्य अनुमान पर आधारित माना जा रहा है।
महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी चर्चा बनी हुई है। 63 सदस्यीय सूची में सीमित महिला भागीदारी को लेकर कुछ सामाजिक और राजनीतिक हलकों में सवाल उठाए गए हैं।
चित्तौड़गढ़ से कृष्णपाल सिंह चुंडावत को प्रदेश मंत्री बनाए जाने को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज रही। संगठन के भीतर यह चर्चा सामने आई कि पूर्व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष एवं चित्तौड़गढ़ सांसद चंद्रप्रकाश जोशी की अनुशंसा पर कांग्रेस पृष्ठभूमि से आए कृष्णपाल सिंह को जिम्मेदारी दी गई। वहीं कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन में वर्षों से सक्रिय और युवाओं में मजबूत पकड़ रखने वाले कई पुराने भाजपाई कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया। हालांकि भाजपा की ओर से सार्वजनिक रूप से इसे संगठनात्मक आवश्यकता, सामाजिक संतुलन और चुनावी रणनीति का हिस्सा बताया गया है।
इसी संदर्भ में राजनीतिक हलकों में पूर्व प्रदेशाध्यक्ष चंद्रप्रकाश जोशी के कार्यकाल को लेकर भी चर्चाएं सामने आई हैं। संगठन से जुड़े लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उनके प्रदेशाध्यक्ष रहते हुए भाजपा युवा मोर्चा सहित कई मोर्चों की कार्यकारिणियां लंबे समय तक घोषित नहीं हो पाई थीं। कुछ लोग इसे संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व की निष्क्रियता के रूप में देखते हैं। इसी कारण कई राजनीतिक हलकों में उनके प्रदेशाध्यक्ष कार्यकाल को अपेक्षाकृत कमजोर या असफल कार्यकाल के रूप में भी चर्चा में लिया जाता रहा है। हालांकि भाजपा की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक मूल्यांकन सार्वजनिक नहीं किया गया है।
राजनीतिक चर्चाओं में यह भी उल्लेख किया जा रहा है कि उनके प्रदेशाध्यक्ष रहते हुए चित्तौड़गढ़ विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई थी। वहीं स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में यह दावा भी किया जाता रहा है कि वे अपने गृह वार्ड में भी भाजपा प्रत्याशी को अपेक्षित समर्थन नहीं दिला पाए थे। हालांकि इन दावों को लेकर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा यह भी चर्चा में लाया जा रहा है कि गत लोकसभा चुनाव में भाजपा को राजस्थान की 25 में से 14 सीटों पर ही जीत मिली थी। साथ ही कुछ राजनीतिक हलकों में यह टिप्पणी भी की जाती रही है कि चंद्रप्रकाश जोशी का प्रभाव अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर सीमित नजर आया। हालांकि पार्टी की ओर से चुनावी प्रदर्शन को सामूहिक संगठनात्मक परिणाम बताया गया था।
यह चर्चा भी राजनीतिक हलकों में समय-समय पर उठती रही है कि चंद्रप्रकाश जोशी स्वयं भी वर्षों पहले कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए थे। इसी संदर्भ में अब कांग्रेस पृष्ठभूमि से आए नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिए जाने को लेकर सोशल मीडिया और संगठनात्मक हलकों में बहस देखने को मिल रही है।
नई कार्यकारिणी को लेकर संगठनात्मक शैली पर भी चर्चा सामने आई है। कुछ कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पोस्टों में आरोप लगाए गए कि प्रदेश दौरों और कार्यक्रमों के दौरान स्थानीय इकाइयों पर स्वागत और शक्ति प्रदर्शन को लेकर दबाव बनाया जाता है। कुछ पोस्टों में “फोन करके स्वागत करवाने” जैसी बातें भी कही गईं। हालांकि इन आरोपों को लेकर कोई आधिकारिक दस्तावेज, ऑडियो या संगठनात्मक पुष्टि सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है और न ही भाजपा संगठन द्वारा इस संबंध में कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई घोषित की गई है। इसलिए इन्हें फिलहाल राजनीतिक आरोप और अंदरूनी असंतोष के रूप में ही देखा जा रहा है।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि नई टीम में ऐसे चेहरों को जिम्मेदारी दी गई है जिन पर पहले राजनीतिक विवाद या चर्चाएं रही हैं। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि सभी नियुक्तियां संगठनात्मक क्षमता, सामाजिक संतुलन और आगामी चुनावी रणनीति को ध्यान में रखकर की गई हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा युवा मोर्चा की यह नई टीम अब निकाय और पंचायत चुनावों में पार्टी के युवा अभियान की मुख्य जिम्मेदारी निभाएगी। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संगठन क्षेत्रीय, सामाजिक और कार्यकर्ता संतुलन से जुड़े उठ रहे सवालों को किस प्रकार संभालता है। निकाय और पंचायत चुनावों से पहले घोषित यह टीम अब केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर नेतृत्व शैली, कार्यकर्ता संतुलन और राजनीतिक स्वीकार्यता की भी परीक्षा मानी जा रही है।
(अशोक लोढा)

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