तेरी यादों का मौसम रहा पहर-दर-पहर,
दिल में इक दर्द पलता रहा पहर-दर-पहर।
चाँद ख़ामोश था, चाँदनी भी उदास,
कोई साया भटकता रहा पहर-दर-पहर।
नींद आँखों की चौखट पे आकर रुकी,
ख़्वाब तेरा ही सजता रहा पहर-दर-पहर।
तेरी ख़ुशबू किसी नरम झोंके की तरह,
मेरे कमरे में ठहरता रहा पहर-दर-पहर।
दिल ने चाहा कि तुझको भुला दूँ मगर,
नाम तेरा ही उभरता रहा पहर-दर-पहर।
कुछ दुआएँ लबों तक तो आईं मगर,
दर्द चुपचाप सुनता रहा पहर-दर-पहर।
‘राहत’ उस शख़्स की याद का क्या कहें,
रूह में रंग भरता रहा पहर-दर-पहर।
” राहत टीकमगढ़”