राम लौटे हैं अयोध्या में, फिर दीपों का मेला है,
सदियों की सूनी पलकों पर, सपनों का उजियाला है।
राम लौटे हैं अयोध्या में…
सरयू गाए मंगल-गाथा, नभ जय-जयकारें करता है,
हर पत्थर में राम-नाम का, अक्षय स्वर झरता है।
तप की अग्नि, त्यागों की बेला, श्रद्धा का अभिनंदन है,
यह केवल मंदिर नहीं, राष्ट्र-आत्मा का वंदन है।
हर आहट में आज सुनाई, मर्यादा का रेला है,
सदियों की सूनी पलकों पर, सपनों का उजियाला है।
राम लौटे हैं अयोध्या में…
राम न केवल राजतिलक हैं, जन-जन की अभिलाषा हैं,
शबरी की आँखों की प्रतीक्षा, केवट की परिभाषा हैं।
वन की पगडंडी पर चलकर, मानवता को मान दिया,
टूटे मन के हर कोने को, अपनेपन का दान दिया।
आज अयोध्या के कण-कण में, युग का नव-उद्घोष जगा,
सदियों की निस्तब्ध व्यथा से, स्वर्णिम विश्वास जगा।
राम लौटे हैं अयोध्या में…
जब अन्यायों का अंधियारा, धरती को घेरने लगता है,
तब रामत्व का एक दीपक, युग का पथ फेरने लगता है।
मंदिर का वैभव क्या होगा, यदि मन में अभिमान रहे,
राम वहीं बसते हैं जहाँ पर, प्रेम और सम्मान रहे।
हर धड़कन में गूँज रहा है, मर्यादा का मधुर विधान,
सदियों की तपती आशा को, मिल गया आज नया सम्मान।
राम लौटे हैं अयोध्या में…
घर-घर दीप जलें ऐसे कि, मन का तम भी दूर हो,
रामराज की परिभाषा में, कोई न कभी मजबूर हो।
न्याय मिले निर्बल को भी, भूखे को सम्मान मिले,
भारत की हर साँस को फिर, राम-नाम का दान मिले।
राहत कहे, इस मंदिर से, जग को नया उजाला है,
सदियों की सूनी पलकों पर, सपनों का उजियाला है।
राम लौटे हैं अयोध्या में, फिर दीपों का मेला है,
सदियों की सूनी पलकों पर, सपनों का उजियाला है।
“राहत टीकमगढ़”